बीड़ी उद्योग पर संकट गहराया ,कोटपा एक्ट में संशोधन को लेकर ,सख्त होगा कानून

बीड़ी उद्योग पर संकट गहराया ,कोटपा एक्ट में संशोधन को लेकर ,सख्त होगा कानून

सागर। ( तीनबत्ती न्यूज़. कॉम ) ।   एमपी में बीड़ी के कारोबार का अपना इतिहास है।  बुंदेलखंड में सागर और जबलपुर के बीच लगभग दो सौ वर्ष पूर्व हुआ था। तेंदू पत्ते की भरपूर उपलब्धता के करण मध्य प्रदेश में यह उद्योग ८० के दशक में अपनी चरम सीमा पर था। तत्पश्चात् सरकारी रोक-टोक के चलते इस उद्योग का पलायन पश्चिम बंगाल और दक्षिण एवं पूर्व भारत के राज्यों की ओर होता चला गया। आज कई ऐसे क़ानून आ रहे हैं जो बीड़ी उद्योग को निश्चित रूप से ख़ाक में मिला देंगे। कोरोना काल में संकटो से जूझ रहे बीड़ी जैसे  कुटीर उधोग के सामने नए नए संकट पैदा 
हो रहे है। 

कोटपा की नई नियमावली, दुकानदार को कराना होगा रजिस्ट्रेशन 

कोटपा अर्थात् सिगरेट एंड अदर टबैको प्रॉडक्ट्स ऐक्ट क़ानून २००३ में हाल ही में संशोधन कर ३१-दिसम्बर-२०२० को नयी नियमावली ज़ारी की गयी ।  संशोधन अगले महीने फरवरी माह से लागू हो जाएंगे। इन पर चर्चा करने सरकार ने वक्त भी कम दिया है। 
जिसके नियम बीड़ी उद्योग के लिए पूर्णतः अव्यवहारिक हैं। नियमों के अनुसार बीड़ी निर्माता बीड़ी के बंडल पर अपने ब्रांड या लेबल का चित्र नहीं दर्शा सकते हैं। दुकानदार अपनी दुकान पर बीड़ी-बण्डलों को प्रदर्शित नहीं कर सकते हैं। ऐसे में ग्राहक कैसे समझेगा कौनसा दुकानदार बीड़ी बेचता है और कौनसा नहीं? ग्राहक अपने पसंदीदा ब्रांड की बीड़ी को भी नहीं पहचान पाएगा। खुली बीड़ियों का विक्रय प्रतिबंधित रहेगा। हर बंडल २५ बीड़ी का ही होना चाहिए। हर बंडल पर MRP और निर्माण की तारीख़ छपी होना अनिवार्य होगा। बीड़ी की पैकिंग की प्रक्रिया को रिलाई कहते हैं जो पूर्णतः हाथों से की जाती है न की मशीन से। उपरोक्त नियमों को रिलाई की प्रक्रिया में शामिल करना नामुमकिन है।  इसके अतिरिक्त हर बीड़ी निर्माता, ठेकेदार, व्यापारी, डीलर, डिस्ट्रिब्युटर, पनवाड़ी एवं दुकानदार को कोटपा के तहत पंजियन करवाना अनिवार्य होगा। ऐसा न होने पर लाखों के जुर्माने सहित जेल होगी। 

कोटपा क़ानून की नवीनतम नियमावली को ध्यान से पढ़ें तो कोई भी व्यक्ति अपने घर के बाहर धूम्रपान नहीं कर सकता। ऐसा प्रतीत होता है कि बीड़ी को गाँजा या ड्रग्स की श्रेणी में रख दिया गया है। और तो और कोटपा के किसी भी नियम को तोड़ना एक दण्डनीय अपराध माना गया है और ऐसा होने पर सात वर्ष तक का कारावास और करोड़ों का जुर्माना भी लग सकता है। हैरत की बात यह है कि कोटपा के तहत यह नियमावली दिसम्बर में बनी और इसे फ़रवरी से लागू किया जाना है। इसके संदर्भ में बीड़ी मज़दूरों, निर्माताओं, रिलाईवालों, तेंदू-पत्ता संगों, रीटेलर-संगों, पनवाड़ियों, तम्बाकू किसानों इत्यादि को अपना पक्ष रखने का मौक़ा ही नहीं दिया गया। बजट में बीड़ी पर अत्यधिक टैक्स बढ़ने की ख़बर भी चल रही है। ऐसा हुआ तो निश्चित ही यह बीड़ी उद्योग का अंत होगा। यदि बीड़ी ही नहीं रही तो राज्य-सरकारों से टेंडरों में ख़रीदे गए तेंदू-पत्ते का क्या मूल्य रह जाएगा?! 
बीड़ी मूलतः ग्रामीण-कुटीर उद्योग है जो देश भर में २.६ करोड़ तम्बाकू किसानों, ८५ लाख बीड़ी श्रमिकों, ४० लाख से अधिक आदिवासी-तेंदू-पत्ता-संग्राहक परिवारों और ७५ लाख पनवाड़ियों के रोज़गार का माध्यम है। इस उद्योग को न तो बिजली और न ही पानी की आवश्यकता पड़ती है। अतः इसका कार्बन-उत्सर्जन और कार्बन-पदचिह्न बहुत कम है। लेकिन आज इस उद्योग को सिगरेट और गुटका जैसे उद्योगों के समतुल्य रख इसपर मशीन-निर्मित उत्पादों के नियम लगाए जा रहे हैं जो इसे धीरे-धीरे ख़त्म कर रहे हैं।


क्या बीड़ी उद्योग  बन्द हो जाएगा....

नियमों से चलने वाले निर्माता तो इस प्रश्न का उत्तर "हाँ" में देते हैं। मध्यप्रदेश बीड़ी उधोग संघ के अनिरुद्ध पिम्पलापुरे कहते है कि कोटपा के जो नए संशोधन होने वाले है । उसके अनुसार तो बीड़ी का कारोबार बंद होने की कगार पर आ जायेगा। कोरोना काल मे बड़ी मुश्किल हुई है। देखे तो बीड़ी बनाना आत्मनिर्भर जैसा काम है। घरों में बैठकर लोग अपनी सुविधानुसार बनाते है। 

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संशोधन अव्यवहारिक: कामरेड अजित जैन

बीडी कामगार यूनियन से जुड़े और एटक के राज्य महासचिव कामरेड अजित जैन कोटपा में होने जा रहे संशोधन को बिल्कुल अव्यावहारिक, अनुचित और कुटीर उद्योग को बंद करने वाला बताया है । जिसके दुष्परिणाम सामने आयेगे ।उन्होने कहा कि बीडी उधोग से देश भर में 15 करोड लोग जुडे हैं ।  जिससे रोजगार पर कुठाराघात होगा । संशोधन में जो बाते कही जा रही है वे सब समझ से परे है । कुटीर उद्योग को बंद करके मशीनीकृत उधोग को बढावा देने वाला है । एक बीडी के पांच लायसेंस लेने पडेगे ।

तेंदूपत्ता तुड़ाई के ठेको के बीच नए संसोधन

एमपी में तेंदूपत्ता संग्रहण के ठेके 2021 के हो चुके। सरकार को 11 सौ करोड़ से अधिक का लाभ मिलेगा। यहां सवाल उठता है कि यदि बीड़ी के कारोबार पर इन नए नियमो के चलते विपरीत असर पड़ा तो इस तेंदूपत्ते का सरकार क्या करेगी ? 

बीड़ी के अवैध कारोबारियों को इन नियमो का कोई असर नही पढ़ने वाला है।  वीराने में जंगल से तेंदू-पत्ता चुराकर अपने खेत की तम्बाकू से नगद में मज़दूरी देकर बिना चित्रात्मक चेतावनी के बीड़ी बनाकर नगद विक्रय करने वाले निर्माता को न ही कोटपा रोक पाएगा और न ही कर-चोरी का भय।  भविष्य में बीड़ी का धंधा नियम कानूनों से चलने वालों के लिए मुसीबत होगा। चोरों और अवैध कारोबारियों के हवाले हो जाएगा। 



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