“ रामायण रासो “ का विमोचन जगद्गुरु श्री श्री रामभद्राचार्य जी के कर कमलों से होगा : डॉ प्रदीप पांडेय की पुस्तक
तीनबत्ती न्यूज|17 मई,2026
सागर: श्यामलम अध्यक्ष उमाकांत मिश्र ने बताया कि डॉ प्रदीप पाण्डेय की रचना “रामायण रासो “ भारतीय संस्कृति, सनातन मूल्यों और गौरवशाली साहित्यिक परंपरा को एक नए शिखर पर ले जाने वाला अनूठी एवं साहित्य के क्षेत्र की वृहद घटना है । जिसके माध्यम से आने वाले समय में अनेक साहित्यिक परिवर्तन देखने भी मिलेंगे। प्रतिष्ठित संस्थान भारतीय ज्ञानपीठ द्वारा प्रकाशित महाकाव्य 'रामायण रासो' का विमोचन तुलसी पीठ के पीठाधीश्वर जगतगुरू श्री श्री रामभद्राचार्य के कर कमलों से होगा जिस हेतु उनकी अनुमति 24 जून 2026 की चित्रकूट की प्राप्त हुई है। इस ऐतिहासिक कृति की विशेषताओं, इसके पीछे की प्रेरणा और विमोचन समारोह की विस्तृत रूपरेखा को सार्वजनिक करने के लिए का आयोजन किया गया है।
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'रामायण रासो' केवल एक पुस्तक नहीं, बल्कि एक युगप्रवर्तक साहित्यिक प्रयास है, जिसमें रामायण के महान आदर्शों को 'रासो' काव्य शैली की ओजस्वी और प्रभावशाली भाषा में पिरोया गया है। यह ग्रंथ पाठकों को मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम के जीवन के उन अनछुए और गहन प्रसंगों से परिचित कराएगा जो समकालीन समाज के लिए अत्यंत प्रासंगिक हैं। साथ ही आदिकाल से सुषुप्त अवस्था को व्याप्त यह बिधा जो जिसमें विगत चार सौ वर्षों से लेखन कार्य नहीं हुआ व रासो में प्रकाशित रचनाएं आज पूरे भारत से प्राय: समाप्त हो चुकी है ऐसी स्थिति यह रामायण रासो साहित्य के नव जागरण में भी कारगर सिद्ध होगा एवं यह “ रासो ” विधा के नवलेखन हेतु प्रेरित भी करेगा।
पहली दफा रामायण,रासो परम्परा में
विषय पर चर्चा करते हुए कृति के लेखक डॉ प्रदीप पाण्डेय ने 'रामायण रासो' की मुख्य विशेषताएं और विस्तृत पृष्ठभूमि के बारे बताते हुए कहा कि रासो शैली का यह अभिनव प्रयोग है,अमूमन 'रासो' काव्य परंपरा को ऐतिहासिक राजाओं की वीरता और शौर्य गाथाओं से जोड़कर देखा जाता रहा है और ऐसा प्रचार भी हुआ जबकि ऐसा नहीं है। इस ग्रंथ में पहली बार इस ओजस्वी शैली का उपयोग भगवान श्रीराम के मर्यादित जीवन, उनके शौर्य, धर्म-युद्ध और लोकरंजन के स्वरूप को निखारने के लिए किया गया है। इस महाकाव्य की रचना में शोध परिश्रम, विभिन्न प्राचीन रामायणों का तुलनात्मक अध्ययन शामिल हैं। यह आधुनिक पीढ़ी के तार्किक सवालों का आध्यात्मिक और ऐतिहासिक समाधान प्रस्तुत करता है।
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भाषाई और काव्यात्मक सौंदर्य
ग्रंथ की भाषा न केवल साहित्यिक दृष्टि से समृद्ध है, बल्कि इसमें प्रवाह और गेयता (लयबद्धता) भी है, जो पाठकों और श्रोताओं को आदि से अंत तक बांधे रखती है।
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युवा पीढ़ी के लिए यह नैतिक सेतु भी है आज के तकनीकी और आपाधापी से भरे युग में, यह ग्रंथ युवा मानस को अपनी जड़ों, पारिवारिक मूल्यों और कर्तव्य पथ पर अडिग रहने की प्रेरणा देने में एक मार्गदर्शक की भूमिका निभाएगा। "रामायण हमारी चेतना का आधार है। 'रामायण रासो' के माध्यम से हमारा प्रयास श्रीराम के उसी लोक-कल्याणकारी और मर्यादा-रक्षक स्वरूप को एक नई काव्यात्मक ऊर्जा के साथ सामने लाना है। हमें विश्वास है कि यह कृति साहित्य जगत और जनमानस में एक नया वैचारिक विमर्श पैदा करेगी।" प्रेस वार्ता के दौरान साहित्यकार राजकुमार तिवारी, अंबिका यादव, दामोदर अग्निहोत्री सहित संस्था के सदस्य उपस्थित रहे।
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एडिटर : विनोद आर्य
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