21 जून 2026 : अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस पर विशेष
" योग एक सार्वभौमिक मानव धर्म "
▪️वेद प्रकाश शर्मा, IPS (से.नि) पूर्व अध्यक्ष, मध्य प्रदेश योग आयोग
21 जून को विश्व के सभी राष्ट्र अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के रूप में मनाते हैं। भारत के यशस्वी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के प्रयासों से भारतीय प्राच्य विद्या को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक ख्याति एवं स्वीकृति प्राप्त हुई है। योग को जन-जन तक पहुँचाने तथा इसे सर्वलोकप्रिय बनाने में योग ऋषि स्वामी रामदेव जी की भी अग्रणी भूमिका रही है। आज योग रूपी आध्यात्मिक सुगंध भारत से निकलकर समस्त विश्व में फैल चुकी है। यह मानवता के अस्तित्व और विकास के लिए अत्यंत सुखद एवं शुभ संकेत है।
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वर्तमान समय में प्रायः योग का अर्थ केवल आसन और प्राणायाम करना समझ लिया जाता है, जबकि योग को केवल आसन-प्राणायाम तक सीमित करना उचित नहीं है। योग एक संपूर्ण जीवन-दर्शन, जीवन जीने की कला तथा एक सार्वभौमिक मानवधर्म है।
योग शब्द युज धातु से निष्पन्न होता है जिसका अर्थ है "युजिर योगे जीवात्मा और परमात्मा के मिलन का नाम योग है। योग का दूसरा अर्थ है अर्थात् योग जोड़ने का नाम है । युज समाधौ योग समाधि है । दूसरे शब्दो में इन्द्रियों का मन मन का आत्मा और आत्मा का परमात्मा से जुड़ना योग है।
"योगश्यचित्तवृति निरोधः चित्त वृत्तियों का निरोध योग है।
"योगः कर्मसु कौशलम" योग से कर्मों में प्रवीणता प्राप्त होती है। यह योग का व्यवहारिक स्वरूप है ।
योगः समाधि समाधि का नाम योग है। यह योग का आध्यात्मिक स्वरूप है। समत्वं योग उच्चयते समता के भाव में रहना योग है।
बहुधा काल के प्रवाह में शब्दों के निहित अर्थ बदल जाते हैं। लोग शब्दों के मूल अर्थ को भूलकर केवल प्रचलित अर्थों को ही स्मरण रखते हैं। "धर्म" शब्द के साथ भी यही हुआ है। आज धर्म को केवल उपासना पद्धति से जोड़ दिया गया है, जबकि यह उसकी संपूर्ण परिभाषा नहीं है।
महर्षि मनु ने धर्म को इस प्रकार परिभाषित किया है- धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः ।धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम ॥ अर्थात् धैर्य, क्षमा, इन्द्रिय संयम, चोरी न करना, शुद्धता, इन्द्रियनिग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य तथा अक्रोध ये धर्म के दस लक्षण हैं।
शास्त्रों में कहा गया है-धारणाद्धर्म इत्याहुः। अर्थात् जो धारण किया जाए, वही धर्म है।
महर्षि दयानन्द सरस्वती ने आर्य समाज के पाँचवे नियम में कहा है कि सभी कार्य धर्मानुसार अर्थात् सत्य और असत्य का विचार करके करने चाहिए। उनके अनुसार सत्य ही धर्म है।
महर्षि पतंजलि ने योगाभ्यास के लिए अष्टांग योग का विधान किया है, जो इस प्रकार है- यम, नियम, आसन प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि।
अष्टांग योग के प्रथम दो अंग-यम और नियम योगाभ्यासी की आचार संहिता (Code of Conduct) हैं।
यम पाँच हैं- अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह।ये पाँच यम समाज में मनुष्य के व्यवहार के मानदण्ड निर्धारित करते हैं।
यदि समाज के सभी लोग अहिंसा का पालन करें तो परस्पर द्वेष, हिंसा और वैमनस्य स्वतः समाप्त हो जाऐंगे। यही द्वेषभाव हिंसा, क्रोध और अपराधों का मूल कारण है। इसलिए जैन दर्शन में कहा गया है- अहिंसा परमो धर्मः ।सत्य का पालन समाज को भ्रष्टाचार से मुक्त कर सकता है। आज भ्रष्टाचार सर्वव्यापी होकर समाज की सबसे बड़ी चुनौती बन गया है। इसका स्थायी समाधान सत्य का आचरण है, जिसकी शिक्षा योग देता है।
अस्तेय अर्थात् चोरी न करना। यदि व्यक्ति अचौर्यव्रत धारण कर ले तो आर्थिक अपराध, घोटाले, रिश्वतखोरी और काला बाज़ारी जैसी समस्याएँ समाप्त हो सकती हैं।
अपराधों पर नियंत्रण
बढ़ते हुए यौन अपराधों के मूल में ब्रह्मचर्य की उपेक्षा है। इन अपराधों का संबंध मनोवृत्तियों से है, इसलिए केवल कानून इनके पूर्ण समाधान में सक्षम नहीं हो सकता। इसका वास्तविक समाधान ब्रह्मचर्य का पालन है।
आज का समाज उपभोक्तावाद से प्रभावित है। मनुष्य की इच्छाएँ निरंतर बढ़ती जा रही हैं। उनकी पूर्ति के लिए वह उचित अनुचित सभी प्रकार के साधनों का उपयोग करता है। इससे असंतोष, तनाव और सामाजिक विषमता बढ़ती है। इसका समाधान है अपरिग्रह-अर्थात् अनावश्यक वस्तुओं और विचारों का त्याग तथा जीवन की आवश्यकताओं को सीमित करना, ताकि दूसरों की आवश्यकताएँ भी पूरी हो सकें।
अष्टांग योग का दूसरा अंग है नियम। नियम मनुष्य का स्वयं के प्रति कर्तव्यों का निर्धारण करते है। इनका पालन करने से मनुष्य की आत्मोन्नति का मार्ग प्रशस्त होता हैं। ये पाँच हैं-शौच, संतोष, तप, स्वाध्याय और ईश्वर-प्रणिधान ।
शौच का अर्थ है बाह्य और आंतरिक शुद्धि। बाह्य शुद्धि जल आदि से तथा आंतरिक शुद्धि सत्य, ज्ञान और तप के अनुष्ठान से होती है।
आज लोगों में असंतोष बढ़ता जा रहा है, जिसके कारण अनेक मानसिक और शारीरिक रोग उत्पन्न हो रहे हैं। इसका समाधान है संतोष। संतोष का अर्थ आलस्य नहीं, बल्कि धर्म और न्यायपूर्वक पूर्ण पुरुषार्थ करने के पश्चात जो प्राप्त हो उसमें संतुष्ट रहना तथा निरंतर श्रेष्ठ प्रयास करते रहना है।
तप का अर्थ है-कर्तव्यपालन एवं सत्याचरण में आने वाली कठिनाइयों को सहर्ष सहन करना और उनसे विचलित न होना। वर्तमान समय में बढ़ती असहिष्णुता का समाधान तप का अभ्यास है।
स्वाध्याय आत्म-विकास का महत्वपूर्ण साधन है। प्रत्येक व्यक्ति को उत्तम साहित्य का अध्ययन तथा तपस्वी, धर्मात्मा और परोपकारी विद्वानों का सत्संग करना चाहिए।
नियम का पाँचवाँ अंग है ईश्वर-प्रणिधान। यह मनुष्य को भय, चिंता और अहंकार से मुक्त करता है। अपने समस्त कर्मों को ईश्वर को समर्पित कर देना तथा कर्मफल की इच्छा न करना ही ईश्वर-प्रणिधान है। इससे कर्त्तापन का भाव समाप्त होता है और आध्यात्मिक यात्रा का शुभारंभ होता है। यम और नियमों का सम्यक पालन करने के पश्चात ही साधक आसन और प्राणायाम का वास्तविक अधिकारी बनता है। यम और नियम में धर्म के सभी दस लक्षण समाहित हैं ।
महर्षि पतंजलि कहते हैं- स्थिरसुखमासनम् । अर्थात् जिस स्थिति में स्थिरता और सुखपूर्वक रहा जा सके, वही आसन है।
हठयोग में वर्णित विभिन्न आसनों के अभ्यास से शरीर स्वस्थ, लचीला और निरोग बनता है। आसन-सिद्धि के पश्चात प्राणायाम का अभ्यास किया जाता है। प्राणायाम द्वारा श्वास-प्रश्वास पर नियंत्रण स्थापित कर मन और इन्द्रियों को संयमित किया जाता है।
पतंजलि योगसूत्र में चार प्रकार के प्राणायामों का उल्लेख मिलता है-बाह्य, आभ्यन्तर स्तम्भवृत्ति और बाह्याभ्यन्तर विषयाक्षेपी इनके अभ्यास से चित्त की वृत्तियाँ शांत होती हैं तथा मन पर नियंत्रण प्राप्त होता है।
हठयोग में वर्णित प्राणायाम, जैसे कपालभाति, अनुलोम-विलोम, उज्जायी, भ्रामरी आदि, शारीरिक एवं मानसिक स्वास्थ्य के लिए अत्यंत लाभकारी हैं। इनके नियमित अभ्यास से रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है तथा अनेक रोगों में लाभ प्राप्त होता है। प्राणायाम के माध्यम से प्राणों पर नियंत्रण स्थापित होता है, जिसके परिणामस्वरूप मन और इन्द्रियाँ भी संयमित हो जाती हैं।
मन और इन्द्रियों को उनके विषयों से हटाकर भीतर की ओर मोड़ने को प्रत्याहार कहा जाता है। जब मन को एकाग्र करके किसी एक स्थान या विषय पर स्थिर किया जाता है, तो उसे धारणा कहते हैं। धारणा के स्थान पर ईश्वर के गुण, कर्म और स्वभाव का निरंतर चिंतन-मनन करना ध्यान है। ध्यान की परिपक्वता और निरन्तरता समाधि है। समाधि की अवस्था में साधक को आत्मा और परमात्मा के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान प्राप्त होता है। महर्षि पतंजलि ने इस स्थिति का वर्णन करते हुए कहा है-
"तदा द्रष्टुः स्वरूपेऽवस्थानम् ।"
अर्थात् उस अवस्था में जीवात्मा अपने और परमात्मा के स्वरूप में अवस्थित होता है।
समाधि प्राप्त साधक आप्तकाम हो जाता है। उसके लिए कुछ और जानना या प्राप्त करना शेष नहीं रहता। ऐसा साधक ही मुक्ति अथवा मोक्ष का अधिकारी बनता है।
वर्तमान युग में मनुष्य अविद्या, अस्मिता, राग, द्वेष और अभिनिवेश नामक पाँच क्लेशों से ग्रस्त है। वह इन क्लेशों से मुक्त होना चाहता है, किन्तु उसे उचित मार्ग दिखाई नहीं देता। समस्त प्रकार के क्लेशों, दुःखों और मानसिक अशान्ति से पूर्ण मुक्ति का एकमात्र मार्ग योग है। योग प्राचीन भारतीय ज्ञान-परंपरा का अभिन्न अंग है। इसके नियमित अभ्यास और आचरण से मनुष्य दुःखों से मुक्त होकर सुख, शांति और संतुलन प्राप्त कर सकता है। इतना ही नहीं, योग विश्व में शांति और सद्भाव स्थापित करने का भी सशक्त माध्यम है। आज जब अनेक राष्ट्र युद्ध, तनाव और संघर्ष की परिस्थितियों से गुजर रहे हैं, तब योग ही मानवता को एकता, सह-अस्तित्व और शांति शांति का मार्ग दिखा सकता है। इस प्रकार योग केवल आसन प्राणायाम अथवा व्यायाम नहीं है अपितु एक सार्वभौमिक मानव धर्म है जिसके पालन करने से मानव मात्र सम्पूर्ण दुखों से छूट कर सुखमय जीवन व्यतीत कर सकता है और मानव जीवन के परम लक्ष्य को प्राप्त कर सकता है ।
मनाये योग दिवस
आइए, 21 जून को को मनाए जाने वाले अंतर्राष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर हम सभी नियमित योगाभ्यास करने, योग के सिद्धांत सिद्धांत को अपने जीवन में आत्मसात करने तथा योगमय जीवन जीने का संकल्प लें। लें।
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एडिटर : विनोद आर्य
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