समाज में बदलाव का सशक्त सन्देश देते हैं नाटक : रघु ठाकुर
▪️नाटक संवाद का जीवंत और प्रभावी माध्यम है : सांसद डॉ. लता वानखेड़े
▪️विश्वविद्यालय में राष्ट्रीय नाट्य समारोह का आयोजन
तीनबत्ती न्यूज : 22 फरवरी, 2026
सागर,: डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर में उत्तर-मध्यक्षेत्र सांस्कृतिक केन्द्र, प्रयागराज, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार एवं विश्वविद्यालय सांस्कृतिक परिषद् के संयुक्त तत्वावधान में दिनांक 20 फरवरी से 24 फरवरी 2026 को पाँच दिवसीय राष्ट्रीय नाट्य उत्सव का आयोजन किया जा रहा है । इस क्रम में सायंकालीन सत्र में हैप्पी रणजीत सिंह के निर्देशन में विश्वप्रसिद्ध नाटक ‘सारे मेरे बेटे’ का प्रभावशाली मंचन किया गया। यह प्रस्तुति नई दिल्ली की संस्था यूनिकॉर्न एक्टर्स स्टूडियो द्वारा दी गई। यह नाटक विख्यात अमेरिकी नाटककार आर्थर मिलर की कालजयी कृति ऑल माय सन्स पर आधारित है ।
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नाटक संवाद का जीवंत और प्रभावी माध्यम : सांसद
इस अवसर पर मुख्य अतिथि सागर सांसद डॉ. लता वानखेड़े ने कहा कि नाटक संवाद का जीवंत और प्रभावी माध्यम है। यह हमें अभिव्यक्ति की ताकत देता है और इसमें ऐसे सन्देश निहित होते हैं जो समाज को सूचने पर मजबूर कर देते हैं। उन्होंने कहा कि मैंने मुंबई जैसे शहर में कई फिल्मों की शूटिंग देखी है जिनमें कल्पनाशीलता का काफी पुट होता है। लेकिन इस तरह के नाटक से समाज का और इसमें हो रही घटनाओं का वास्तविक और मार्मिक चित्रण प्रस्तुत होता है जिसका सीधा असर समाज पर पड़ता है । उन्होंने कलाकारों को उनकी शानदार प्रस्तुति के लिए बधाई दी और उत्तर मध्य क्षेत्र सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज और विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में चल रहे इस पांच दिवसीय आयोजन की सराहना की ।
समाज में बदलाव का सशक्त सन्देश देते हैं नाटक : रघु ठाकुर
प्रख्यात समाजवादी चिंतक रघु ठाकुर ने भी इस राष्ट्रीय नाट्य समारोह को अभिनव आयोजन बताया और कहा कि कला में बहुत प्रबल संवाद निहित होता है । यह नाटक समाज में बदलाव का सन्देश देते हुए ऐसी कहानी है जिसमें प्रेम, ममता, दायित्व, मानवता, संवेदनशीलता जैसे मूल्य अन्तर्निहित हैं. जो अंततः बताता है कि हिंसा हारेगी और मानवता और प्रेम जिन्दा रहेंगे । उन्होंने कलाकारों को नाट्य प्रस्तुति हेतु बधाई एवं शुभकामनायें दीं |
इस अवसर पर प्रभारी कुलपति प्रो. दिवाकर शुक्ला ने सांस्कृतिक केंद्र प्रयागराज के निदेशक सुदेश शर्मा एवं उनकी टीम तथा विश्वविद्यालय के सांस्कृतिक परिषद् के मध्य हुए समन्वित प्रयास के लिए आभार प्रकट किया और इतने बड़े स्तर पर किये जा रहे इस आयोजन को छात्रों एवं समाज के नागरिकों के लिए महत्त्वपूर्ण बताया । उन्होंने कहा कि आज युवा डिजिटल मीडिया की तरफ आकर्षित हो रही है लेकिन जो चित्रण, जो संवेदनशीलता और जो अनुभूति नाट्य प्रस्तुतियों में देखने को मिलती है उसकी कोई तुलना नहीं की जा सकती है ।
विश्वप्रसिद्ध नाटक ‘सारे मेरे बेटे’ का प्रभावशाली मंचन
सन् 1946 में रचित यह नाटक द्वितीय विश्व युद्ध के बाद के अमेरिकी समाज की पृष्ठभूमि में रचा गया है, जहाँ एक साधारण-सा दिखने वाला परिवार नैतिक संकटों के भंवर में फँसा हुआ है। कथा के केंद्र में केलर परिवार है जो केलर, उनकी पत्नी केट और उनका पुत्र क्रिस। जो केलर पर आरोप है कि उन्होंने युद्ध के दौरान दोषपूर्ण सिलेंडरों की आपूर्ति की, जिसके कारण 21 सैनिकों की मृत्यु हुई। उनके व्यापारिक साझेदार स्टीव को इस अपराध के लिए कारावास की सजा हुई, किंतु स्टीव का दावा है कि यह निर्णय जो केलर के निर्देश पर लिया गया था।
नाटक की कथा तब और गहराती है जब क्रिस, जो आदर्शवाद और नैतिक मूल्यों का प्रतीक है, अपने पिता के अतीत की सच्चाई को जानने के करीब पहुँचता है। दूसरी ओर, माँ केट अपने बड़े बेटे लैरी के जीवित होने की आशा से बंधी हुई है, जो युद्ध में लापता है। परिवार की सतह पर शांति और सामान्यता दिखाई देती है, किंतु भीतर अपराधबोध, झूठ और आत्मसंघर्ष की आग धधक रही होती है।
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जैसे-जैसे संवाद आगे बढ़ते हैं, सच्चाई की परतें खुलती जाती हैं और यह प्रश्न सामने आता है - क्या व्यक्तिगत लाभ के लिए किया गया अपराध केवल एक कानूनी दोष है, या वह समूचे समाज के प्रति नैतिक अपराध भी है? नाटक का चरम बिंदु दर्शकों को झकझोर देता है, जब यह स्पष्ट होता है कि “मेरे बेटे” केवल अपने घर के बेटे नहीं, बल्कि वे सभी सैनिक थे जो राष्ट्र के लिए बलिदान हुए। यही बोध जो केलर के अंतर्मन को तोड़ देता है और त्रासदी अपने अंतिम रूप में दर्शकों के सामने आती है।
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ये रहे मौजूद
इस अवसर पर प्रो. नवीन कानगो, प्रो. वंदना सोनी, अनीता सोनी, वीनू राणा, डॉ. राकेश सोनी, डॉ. शशि कुमार सिंह, डॉ. विवेक जायसवाल, अल्ताफ मुलानी, डॉ. नीरज उपाध्याय, राजकुमार एवं शहर के गणमान्य नागरिकों, छात्रों की बड़ी संख्या में उपस्थिति रही।











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