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जीवन और समाज के लिए उपयोगी विषयों पर शोध की आवश्यकता: रघु ठाकुर

जीवन और समाज के लिए उपयोगी विषयों पर शोध की आवश्यकता:  रघु ठाकुर


तीनबत्ती न्यूज: 10 जनवरी, 2026

सागर। डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर (मध्य प्रदेश) की शिक्षा शास्त्र अध्ययनशाला के जीवन पर्यंत शिक्षा विभाग द्वारा भारतीय सामाजिक विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICSSR), नई दिल्ली के प्रायोजन से “उच्च शिक्षा में सामाजिक उत्तरदायित्व और सामुदायिक सहभागिता: राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 के संदर्भ में” विषय पर दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का भव्य एवं सार्थक आयोजन किया गया। समापन सत्र का संचालन डॉ. शशि कुमार सिंह ,(सहायक आचार्य, संस्कृत विभाग, डॉक्टर हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय) ने किया तथा अध्यक्षता प्रो. अनिल कुमार जैन अधिष्ठाता शैक्षिक अध्ययनशाला ने कीl  मुख्य अतिथि प्रख्यात सामाजिक चिंतक श्री रघु ठाकुर रहे; विशिष्ट अतिथि प्रो. कौशल किशोर शर्मा पूर्व अधिष्ठाता , जे एन यू नई दिल्ली एवं प्रो. प्रवीण कुमार तिवारी शिक्षा संकाय दिल्ली, प्रो गौरव राव शिक्षा संकाय दिल्ली विश्वविद्यालय दिल्ली उपस्थित रहे l समापन सत्र में समन्वयक डॉ. योगेश कुमार पाल द्वारा स्वागत उद्बोधन एवं संगोष्ठी प्रतिवेदन प्रस्तुत किया गया

मुख्य अतिथि रघु ठाकुर ने कहा कि समुदायिक सहभागिता के लिए कानून भी बनाये जाने चाहिए. देश की बेहतरी के लिए शोध की दिशा और दशा तय होनी चाहिए. शोध के विषय जीवन और समाज के लिए उपयोगी हों. देश के आवश्यकताओं की पूर्ति हो. शोध में शर्त नहीं होनी चाहिए. शोधार्थियों के स्वतंत्र चिंतन को अवसर देने की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि लोकतंत्र में आलोचना को स्वस्थ परम्परा माना जाता है. यदि आलोचनाओं पर प्रतिबन्ध लगने लगेगा तो लोकतंत्र वास्तविक अर्थो में फलीभूत नहीं होगा. छात्र जीवन के कई अनुभवों को साझा करते हुए मनुष्य की संवेदनशीलता का उदाहरण प्रस्तुत किया. सामुदायिक उत्तरदायित्व और सामाजिक सहभागिता के लिए भी कानून बनना चाहिए. तभी सही अर्थो में भागीदारी संभव हो सकेगी. उन्होंने शिक्षा नीति के बारे में बात करते हुए कहा कि पूर्व की शिक्षा नीतियों में भी उच्च शिक्षा में अग्रणी और उसे समय की स्थिति के आधार पर बहुत अच्छे सुझाव दिए थे. 

उन्होंने विश्वविद्यालय के अंदर लोकतांत्रिक मानस पैदा करने की बात की. उन्होंने कहा कि गांव को गोद नहीं लेना है बल्कि गांव की गोद में बैठना है तभी शिक्षण संस्थानों की सामुदायिक और सामजिक सहभागिता संभव है. शिक्षण संस्थाएं आत्मनिर्भर कैसे हो, इस पर विशेष ध्यान देने की जरूरत है. केवल विदेशी विश्वविद्यालय के कैंपस स्थापित करने से हम विश्व गुरु नहीं बन सकते. 


प्रो. कौशल शर्मा ने कहा कि विश्वविद्यालयों को कैसे चिंतनशील प्राणी तैयार करने हैं उनके बारे में स्वयं अपनी पृष्ठभूमि तैयार करनी होंगी।आपने समुदाय और पर्यावरण को केंद्रीय स्तर पर रहने का सुझाव दिया तत्पश्चात विश्वविद्यालय की यह भी जिम्मेदारी है कि उसकी गवर्निंग बॉडी में सोशल वर्कर होने चाहिए, और पंचायत स्तर के लोग विश्वविद्यालय की इसी कमेटी में होने चाहिए। सर ने शिक्षकों के सम्मान की बात करते हुए कहा कि आज के इस समय में भी गांव एवं सुदूर ग्रामीण स्तर के लोग जितना सम्मान शिक्षक का करते हैं उतना और किसी का नहीं  यह भी एक शिक्षक के गौरव की बात हैं। डॉ.शशि रंजन अकेला ने संकल्प से सिद्धि का मूल मंत्र देते हुए कहा कि ऋषि परंपरा का संवहन करने वाली जो भूमि है, 

वह भारत है। उन्होंने बेहतर सामुदायिक कार्य करने वाले शोधार्थी को पुरस्कृत करने की सलाह दी. डॉ. जयंत सिंह तोमर ने गांधी जी के स्वदेशी मूल मंत्र की चर्चा करते हुए विश्वविद्यालयों के स्वेदशी एवं स्वावलम्बन के विचार के साथ कार्य करने की सलाह दी. उन्होंने कहा कि ये गाँधी जी के विचार हैं और आज के समय में उनके विचारों पर अमल करते हुए आगे बढ़ने की जरूरत है. डॉ. सरोज गुप्ता ने राष्ट्रीय शिक्षा नीति पर प्रकाश डालते हुए कहा मध्य प्रदेश भारत का ऐसा प्रदेश है जिसने सबसे पहले राष्ट्रीय शिक्षा नीति को लागू किया।हमारी मूल भाषा मातृभाषा  शिक्षा नीति में सम्मिलित किया गया है।



 प्रो. अनुपम शर्मा ने कहा कि अपने विद्यार्थियों एवं शिक्षकों के माध्यम से समाज में ज्ञान पहुंचाया जाना चाहिएऔर सामाजिक सहभागिता किसी भी माध्यम से की जा सकती है. प्रत्येक वर्ग के सदस्य को सहभागिता में सम्मिलित किया जाना चाहिए

ज्ञान और अनुभव का संगम तभी हो पाएगा, अंत में आपने कहा राष्ट्रीय शिक्षा नीति को धरातल पर उतरने की आवश्यकता है और यह अध्यापक और विद्यार्थियों के द्वारा ही संभव है।

प्रो. अजीत जायसवाल ने कहा कि अनुसंधान एवं नवाचार सामाजिक परिवर्तन के लिए आवश्यक हैं. उन्होंने अग्रणी एवं राष्ट्रीय महत्त्व की शोध संस्थाओं एवं उनकी भूमिका के बारे में बात की.प्रोफेसर गौरव राव जी(शिक्षा संकाय , केंद्रीय शिक्षा संस्थान नई दिल्ली) ने कहा कि सामुदायिक सहभागिता, नागरिक जवाबदेही और अकादमिक क्षेत्र भ्रमण युवाओं के विकास के लिए जरूरी हैं।  डॉक्टर गौरव जी ने बताया की ये तत्व समाज को मजबूत बनाते हैं, व्यावहारिक ज्ञान प्रदान करते हैं और नागरिकों में जिम्मेदारी की भावना जगाते हैं। और सक्रिय भागीदारी पर बल दिया l अध्यक्षीय उद्बोधन में प्रो अनिल कुमार जैन ने युवाओं में सामुदायिक सहभागिता बढ़ाने के लिए अनिवार्य इंटर्नशिप की वकालत की। उन्होंने कहा कि शिक्षा प्रणाली में संवेदनशील पाठ्यचर्या को शामिल करना आवश्यक है, जो छात्रों को सामाजिक मुद्दों के प्रति जागरूक बनाए। उन्होंने राष्ट्रीय जिम्मेदारी की भावना विकसित करने पर बल दिया, ताकि युवा राष्ट्र निर्माण में सक्रिय भूमिका निभा सकें। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि इंटर्नशिप से व्यावहारिक अनुभव मिलता है, जो किताबी ज्ञान से आगे जाता है। उन्होंने शिक्षकों और नीति निर्माताओं से अपील की कि पाठ्यक्रम में सामुदायिक सेवा को अनिवार्य बनाएं, जिससे समाज में सकारात्मक बदलाव आए। डॉ. चिट्ठी बाबू पुच्चा जी द्वारा धन्यवाद ज्ञापन के साथ समाहार सत्र का समापन हुआ, जिसमें नर्मदा मैया वंदन की भावपूर्ण प्रस्तुति ने वातावरण को भावविभोर कर दिया।


इस अवसर पर डॉ. अखिलेश पाठक, समाजसेवी वीनू राणा, प्रो अशोक अहिरवार, विभिन्न विभागों के शिक्षक, शैक्षिक अध्ययन शाला के विद्यार्थी, शोधार्थी एवं विद्यालय प्रतिनिधि एवं प्रतिभागी मौजूद रहे.

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