स्वतंत्र चेतना तभी सार्थक जब व्यक्ति विचार, रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों से मुक्त हो : गवेषणा संवाद
• स्वतंत्रता दिवस पर ‘स्वतंत्र चेतना एक जीवन मूल्य’ विषय पर विचारोत्तेजक संगोष्ठी, स्वतंत्रता के साथ दायित्वबोध और प्रज्ञा को बताया आवश्यक
तीनबत्ती न्यूज, 15 अगस्त 2026
सागर । स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर तिली वार्ड स्थित जिज्ञासा वाचनालय एवं शोध संस्थान में संस्था ‘गवेषणा’ के तत्वावधान में ‘स्वतंत्र चेतना एक जीवन मूल्य’ विषय पर विचारोत्तेजक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। संगोष्ठी में वक्ताओं ने राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ व्यक्ति के वैचारिक, मानसिक और चेतनागत रूप से स्वतंत्र होने की आवश्यकता पर विस्तार से विचार रखा।
वक्ताओं ने कहा कि स्वतंत्रता का अर्थ स्वच्छंदता नहीं है, बल्कि जागरूकता, दायित्वबोध, विवेक और सही-गलत के बीच अंतर करने की क्षमता है। व्यक्ति जब रूढ़ियों, पूर्वाग्रहों और भेदभावपूर्ण मानसिकताओं से मुक्त होकर स्वयं विचार करता है, तभी स्वतंत्रता वास्तविक जीवन-मूल्य का रूप लेती है।
राजनीतिक स्वतंत्रता के साथ वैचारिक स्वतंत्रता भी जरूरी
विमर्श का संचालन करते हुए गवेषणा के अध्यक्ष एवं जिज्ञासा वाचनालय के संस्थापक डॉ. मनोहर लाल चौरसिया ने कहा कि आज राजनीतिक स्वतंत्रता सभी को प्राप्त है, लेकिन सामाजिक और वैचारिक चेतना की स्वतंत्रता पर विमर्श करना भी उतना ही आवश्यक है। उन्होंने कहा कि स्वतंत्र समाज की मजबूती के लिए व्यक्ति का विचारों के स्तर पर स्वतंत्र होना जरूरी है।
गवेषणा के सदस्य सारांश गौतम ने ‘स्वतंत्र’ और ‘चेतना’ दोनों शब्दों की गहराई को समझने की आवश्यकता बताई। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को अपने ‘स्व’ और अपनी चेतना के प्रति जागरूक होना चाहिए। कबीर के “अजहु चेत गँवार” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि सच्ची स्वतंत्रता तभी संभव है, जब व्यक्ति जागरूक और चेतन हो।
गवेषणा के सचिव रमेश चौरसिया ने कहा कि चेतना अपने आप में विचार का महत्वपूर्ण विषय है। चेतना के विभिन्न स्तरों पर व्यापक अध्ययन और शोध हुआ है। यह जानना भी जरूरी है कि हम स्वयं अपनी चेतना के प्रति कितने जागरूक हैं।
दायित्वबोध से जुड़ी है स्वतंत्र चेतना
डॉ. त्रिपुरारी ने स्वतंत्र चेतना को व्यक्ति के दायित्वबोध से जोड़ते हुए कहा कि हम अपने कर्तव्यों, समाज और राष्ट्र के प्रति कितने चैतन्य हैं, यही व्यक्तिगत स्तर पर स्वतंत्र चेतना का प्रमाण है।
सामाजिक रूढ़ियों पर सवाल उठाते हुए फिजियोथेरेपिस्ट रुचि श्रीवास्तव ने ‘कन्यादान’ जैसे प्रचलित शब्दों पर प्रश्न खड़ा किया। उन्होंने कहा कि क्या कन्या कोई वस्तु है, जिसका दान किया जाए? उन्होंने कहा कि पुरातन परंपराओं में जो त्याज्य है, उसे छोड़कर ही समाज स्वतंत्र चेतना की दिशा में आगे बढ़ सकता है।
योग प्रशिक्षक बी.डी. साहू ने कहा कि धर्म, जाति और लिंग आदि के आधार पर बने भेदभावपूर्ण विचारों से ऊपर उठे बिना वास्तविक स्वतंत्रता संभव नहीं है। मनुष्य की गरिमा को ठेस पहुंचाने वाली मानसिकताओं से मुक्ति भी स्वतंत्रता का आवश्यक आयाम है।
डॉ. सरिता चौरसिया ने कहा, “हम स्वतंत्र हों, स्वच्छंद नहीं।” उन्होंने कहा कि स्वतंत्र निर्णय लेते समय यह चेतना भी आवश्यक है कि हमारे निर्णयों से किसी दूसरे व्यक्ति को अनावश्यक नुकसान न पहुंचे। इसे उन्होंने चेतना के उच्च स्तर का प्रमाण बताया।
रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों से मुक्ति जरूरी
भारतीय दर्शन के संदर्भ में दर्शनशास्त्र के विद्यार्थी डॉ. शिव कुमार यादव ने कहा कि भारतीय दर्शन में चेतना के विभिन्न स्तरों पर विशेष जोर दिया गया है। रूढ़िवाद और पूर्वाग्रहों से स्वयं को मुक्त रखना ही स्वतंत्र चेतना की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है।
डॉ. सत्यनारायण देवलिया ने सनातन परंपरा और भारतीय दर्शन का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वतंत्रता से पहले ‘स्व’ को समझना जरूरी है। यदि व्यक्ति अपने स्व और आत्मचेतना के प्रति जागृत है, तो उसके सामाजिक दायित्व और राष्ट्र के प्रति निष्ठा अधिक प्रभावी रूप से सामने आती है।
दर्शनशास्त्र के अध्येता डॉ. अभय कुमार ने कहा कि धर्म, जाति, भाषा और लिंग के भेद से ऊपर उठकर सोचने वाला व्यक्ति ही सच्चे अर्थों में राष्ट्रप्रेम और देशभक्ति का प्रहरी हो सकता है।पूर्व पार्षद कैलाश चौरसिया ने स्वतंत्रता के साथ दायित्वबोध को आवश्यक बताते हुए कहा कि स्वतंत्रता की आड़ में स्वच्छंदता को बढ़ावा नहीं दिया जाना चाहिए। अनुशासन, सामाजिक उत्तरदायित्व और राष्ट्र के प्रति निष्ठा भी स्वतंत्र चेतना का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं। सेवानिवृत्त उप आयुक्त, आदिम जाति कल्याण विभाग, डॉ. शिवकुमार चौरसिया ने कहा कि स्वतंत्र चेतना का संबंध व्यक्ति की प्रज्ञा से है। इसे अराजकता या मनमाने व्यवहार के रूप में देखना उचित नहीं होगा।
वनस्पति वैज्ञानिक डॉ. चंदन कुमार ने कहा कि जो व्यक्ति मन से स्वतंत्र होकर नैतिक दृष्टि से चिंतन कर सकता है, वही स्वतंत्र चेतना को जीवन-मूल्य के रूप में अपना सकता है।
युवाओं के लिए विचार व्यक्त करने की स्वतंत्रता जरूरी
विमर्श को युवा दृष्टिकोण देते हुए जिज्ञासा की छात्रा महिमा ने कहा कि आज के युवाओं के लिए स्वतंत्र चेतना का अर्थ यह भी है कि परिवार उन्हें अपने विचार व्यक्त करने, चीजों को समझने तथा करियर और जीवन से जुड़े निर्णय लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता दें।
असहमति के स्वागत के साथ हुआ सार्थक विमर्श
संगोष्ठी की विशेषता यह रही कि इसमें असहमतियों का भी स्वागत करते हुए स्वतंत्र और खुले विमर्श को स्थान दिया गया। उपस्थित श्रोताओं ने विषय को समकालीन जीवन से सीधे जुड़ा हुआ बताते हुए संगोष्ठी को ज्ञानवर्धक और समय का सार्थक उपयोग बताया।
कार्यक्रम के संयोजक जिज्ञासा वाचनालय के तरुण साहू, सोनू चौरसिया एवं लवकेश अहिरवार ने आयोजन में सक्रिय भूमिका निभाई और उपस्थित जनों के प्रति आभार व्यक्त किया।
संगोष्ठी में हुए विचार-विमर्श का मूल संदेश यही रहा कि स्वतंत्रता केवल बाहरी बंधनों से मुक्ति का नाम नहीं है। विचारों की स्वतंत्रता, रूढ़ियों और पूर्वाग्रहों से मुक्ति, विवेकपूर्ण निर्णय, सामाजिक दायित्व और राष्ट्र के प्रति जिम्मेदारी—इन सभी के समन्वय से ही स्वतंत्र चेतना एक वास्तविक जीवन-मूल्य बन सकती है।











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