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रविवार, 27 दिसंबर 2020

इस साल के आख़िर में पाँच पत्रकारों की पाँच किताबें @ ब्रजेश राजपूत/ ग्राउंड रिपोर्ट

इस साल के आख़िर में पाँच पत्रकारों की पाँच किताबें 

@ ब्रजेश राजपूत/ ग्राउंड रिपोर्ट 

इसे सन 2020 की आखिरी ग्राउंड रिपोर्ट मान कर लिख रहा हूं क्योंकि जब अगली ग्राउंड रिपोर्ट लिखूंगा तो सन 2021 आ जायेगा. कोरोना की महामारी के चलते ये यादगार साल रहा है, पूरी दुनिया के लिये. कोरोना पेंडेमिक, लॉकडाउन और क्वॉरन्टीन सरीखे तकरीबन भुला दिए गए शब्दों से हम सबका एक बार फिर सामना हुआ. देश-दुनिया में कामकाज ठप रहा. मगर कुछ लोग ऐसे थे जिन्होंने इस दौरान लगातार काम किया. कोरोना वॉरियर्स नहीं, मैं उन पत्रकार लेखकों की बात कर रहा हूं जिन्होंने इस महामारी में भी लिखा. सच कहूं तो साल के आखिर में एक से एक बेहतरीन किताबें बाजार में आयीं. कोरोना का रोना धोना तो हमने साल भर किया है इसलिये उसे छोड़ इस वक्त उन किताबों को याद करने का मन कर रहा है जिन्होंने पढ़ने वालों के मन पर छाप छोड़ी.

बात शुरू करते हैं राजनीति से, जिस पर अच्छा पढ़ना और लिखना मेरा पसंदीदा काम है. 2019 के आम चुनावों पर जाने माने पत्रकार राजदीप सरदेसाई की किताब '2019 मोदी की जीत' इस साल हिंदी और अंग्रेजी में आयी. इस किताब को पढ़े बिना आप अंदाजा नहीं लगा सकते कि 2019 के चुनावों में मोदी की ऐतिहासिक जीत के पीछे कितनी योजना और रणनीति और हाड़तोड़ मेहनत हुयी है. करीब चार सौ पन्नों और आठ खंडों में बंटी इस किताब में नरेन्द्र मोदी और अमित शाह पर विस्तार से लिखा गया है. गुजरात से लेकर दिल्ली तक की उनकी राजनीतिक यात्रा के दिलचस्प किस्से तो इसमें हैं ही, साथ ही मोदी की योजना काम करने के तरीके और अमित शाह की लगातार यात्राएं उनके साहसिक फैसले और रात दिन बिना थके काम करने के छोटे छोटे क्षेपकों को पढ़कर आप हैरान रह जायेंगे कि जब अमित शाह कहते हैं कि आने वाले तीस सालों तक बीजेपी राज करेगी तो वो यूं ही नहीं कहते. मोदी-शाह ने दिल्ली की राजनीति का व्याकरण और भाषा बदल दी है. साथ ही देश की स्वतंत्र संस्थाएं कैसे उनकी मर्जी से चलने लगी हैं, इस पर भी राजदीप ने बड़े साहस से लिखा है.

राजदीप के बाद अब बात बिहार के एक नये युवा पत्रकार पुष्यमित्र की किताब 'रुकतापुर' की जो बिहार विधानसभा चुनाव के ठीक पहले आयी. पुष्यमित्र अपने को घुमंतू पत्रकार मानते हैं और इस किताब में उनका घुमंतू साफ दिखता है और लगता है कि एक अच्छे पत्रकार को घुमंतू होना कितना जरूरी है. बिना शहर से बाहर घूमे और गांव में निकले अच्छी कहानियां जिसे हम पत्रकारिता की भाषा में कहते हैं नहीं मिल सकतीं. हालांकि ये अच्छी कहानियां समाज की बुरी कहानियां हैं जो हम पत्रकार सामने लाते हैं. बेहद प्रतिभाशाली लोगों और प्रकृति की मेहरबानियों वाला बिहार जिसमें झारखंड को भी शामिल किया जाये का विकास क्यों रूका हुआ और क्यों ठहरा हुआ है, ये इस किताब के किस्से या कहें रिपोर्ट पढ़कर समझ आ जायेगा. दिल्ली से लेकर मुंबई तक के लोग समझ ही नहीं सकते कि क्यों कोरोना काल में सबसे ज्यादा मजदूर बिहार ही लौटे. क्या हालत है बिहार के गांवों की जहां चमकी बुखार से हर साल हजारों बच्चे दम तोड़ देते हैं तो कोसी की बाढ़ कैसे हर साल हजारों हैक्टेयर की खेती तबाह कर देती है. उसके बाद भी 'सुशासन बाबू' नीतीश कुमार को प्रचारित किया जाता है. हर प्रदेश की कमियों पर ऐसी किताबें आनी चाहिये.

दिल्ली और पटना के बाद बात अब मुंबई के पत्रकार जितेंद्र दीक्षित की किताब 'थर्टी फाईव डेज' की जिसे अंग्रेजी में लिखा है. हम पत्रकार बदलती राजनीति को करीब से देखते हैं. रिपोर्टिंग के दौरान बहुत कुछ ऐसा भी होता है जिसे हम अपनी रिपोर्ट में बता या दिखा नहीं पाते. ऐसे में सबसे बेहतर है कि उस घटनाक्रम पर किताब लिख दें. महाराष्ट्र में 2019 के आखिर में कुछ ऐसा ही हुआ जो लंबे समय तक याद रखा जायेगा. विधानसभा चुनावों के परिणाम आने पर राजनीति ने ऐसी करवट ली कि साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले साथी अलग-अलग हो गये और एक दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ने वाले एक साथ जुड़कर सरकार बना बैठे. महाराष्ट्र में चुनाव परिणाम के बाद पहले बीजेपी और शिवसेना में अलगाव हुआ और फिर एनसीपी में बंटवारा हुआ. बीजेपी ने एनसीपी के साथ सरकार बनानी चाही. नये मुख्यमंत्री और उपमुख्यमंत्री ने शपथ भी ले ली. मगर बात नहीं बनी और तीन दिन में ही ये सरकार गिरी. एनसीपी, कांग्रेस और शिवसेना ने ऐसा गठबंधन बनाया जिसे चुनाव के पहले कोई सोच भी नहीं सकता था. राजनीति संभावनाओं के खेल राजनीति को जितेंद्र दीक्षित ने लगातार कवर किया. बहुत करीब से सारे घटनाक्रम को देखा और यादगार किताब लिख दी.

टीवी पत्रकार पर्दे के पीछे की कहानी ही नहीं लिखते बल्कि न्यूज रूम में टीवी के पर्दे के पीछे जो घट रहा होता है उस पर भी शानदार फिक्सन वाला उपन्यास लिख देते हैं. जी हां, मैं बात कर रहा हूं साल के चर्चित उपन्यास 'नैना' की. जिसे टीवी के वरिष्ट पत्रकार संजीव पालीवाल ने लिखा है. एक बड़े चैनल के न्यूज एंकर की हत्या हो जाती है और उसके बाद शुरू होती है एक किताब, न छोड़ने वाली तफ्तीश जिसमें उस एंकर के संबंधों का दायरा खुलता है, तो कौन है गुनहगार समझना आखिरी पन्ने तक बूझना मुश्किल होता है. टीवी की चमकदार दुनिया के खोखलेपन की रोमांचक कहानी है उपन्यास 'नैना'.

और अब आखिर में मेरी साल की पसंदीदा किताब नाम है जिसका 'बात पैसे की'. आउटलुक मनी की संपादक रह चुकीं मोनिका हालन ने बहुत आसान भाषा में उस दुनिया से पर्दा उठाया है जिससे आम मध्यम वर्गीय पाठक अंजान रहता है. मेहनत से कमाये आपके पैसों से कैसे मेहनत करायें और उसे किन जगहों पर लगाये जिससे आपकी बचत बढ़ती जाये, ये मोनिका की इस किताब का विषय है. शेयर बाजार, म्यूचुअल फंड, जीवन बीमा, गोल्ड, प्रापर्टी से लेकर क्रिप्टोकरेंसी पर ऐसी जानकारी जिसे पढ़कर आप कहेंगे कि काश ये किताब एक दो साल पहले मिल गयी होती तो मेरा बचत ज्यादा बढ़ चुकी होती. कुछ और पत्रकार मित्रों ने इस साल अच्छी किताबें लिखी है, जिनकी जानकारी फिर कभी.

★ ब्रजेश राजपूत, एबीपी नेटवर्क, भोपाल

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