शुक्रवार, 20 मार्च 2020

गोरखनाथ मंदिर में बनता है गोबर से सोना

गोरखनाथ मंदिर में बनता है गोबर से सोना

@गिरीश पांडेय 
लखनऊ ।जिस चीज से धरती सोना (उर्वर) बनती है। हीरे-मोती (अनाज) उगलती है, वह काम भी गोरखपुर के गोरखनाथ मंदिर में करीब पांच साल से हो रहा है। जी हां यह वही मंदिर (मठ) है जिसके पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ तीन साल से उप्र के मुख्यमंत्री हैं।  मंदिर की गोशाला में 400 से अधिक देसी गायें हैं। एक गाय औसतन रोज 18 से 20 किलोग्राम गोबर देती है। मसलन यहां की गोशाला से रोज 7200 से 8000 किलोग्राम गोबर निकलता है। इसका बेहतर उपयोग हो। आसपास बेहतर सफाई रहे इसके लिए गोशाला से सटे ही वर्मी कंपोस्ट (केंचुआ खाद) बनाने की इकाइयां हैं। उस समय योगी जी ने अपनी देख-रेख में पूरे मन से इसे बनवाया था। इससे निकलने वाली खाद मंदिर के पौधों और फूल पत्तियों की हरियाली बढ़ाती है
जैविक खेती की क्रांति में होगी केंचुआ खाद की अहम भूमिका

विशेषज्ञों के अनुसार हमने अधिक पैदावार के लिए रासायनिक खाद एवं कीटनाशकों का बिना सोचे-समझे बेतहाशा प्रयोग किया। इनके जहर से धरती तो बीमार हुई ही। हमारा भोजन, भूगर्भ जल, यहां तक की मां का दूध भी इसकी जद में आ चुका है। भूमि, भोजन, पानी और सबसे बढक़र लोगों के स्वास्थ्य के लिए जैविक खेती और जैविक उत्पाद समय की मांग हैं। जैविक उत्पादों की बढ़ती मांग इसकी संभावनाओं का सबूत है। ऐसे में निकट भविष्य में जैविक खेती में क्रांति  लाजिमी है। स्वाभाविक है कि प्राकृतिक हलवाहा माने जाने वाले केंचुए की इसमें अहम भूमिका होगी।
वर्मी कंपोस्ट की खूबिया
इसमें अन्य जैविक खादों की तुलना में वर्मी कंपोस्ट में 5 गुना नाइट्रोजन, 8 गुना फास्फोरस, 11 गुना पोटाश, 3 गुना कैल्शियम और 2 गुना मैग्निशियम होता है। जिस खेत में इसका प्रयोग होता है उसकी सरंध्रता, पानी जज्ब करने की क्षमता बढ़ जाती है। भूमिगत जलस्तर और जलनिकासी की क्षमता भी बेहतर होती है। कालांतर में भूमि की भौतिक एवं रासायनिक संरचना सुधरने से हम जो भी उर्वरक और पोषक तत्व डालते हैं वे पौधों को आसानी से प्राप्य होते हैं। लिहाजा उपज बढ़ जाती है।

बेमिसाल होती है केंचुए की उत्पादन क्षमता

केंचुए की उत्पादन क्षमता भी बेजोड़ होती है। वह जो खाता है उसका उसका मात्र 5 से 10 फीसद ही अवशोषित करता है। बाकी वह कास्ट (मल) के रूप में निकाल देता है। यही कास्ट वर्मीकंपोस्ट होता है। केंचुआ खाद बनाने की प्रक्रिया भी आसान होती है। इसे अस्थाई छप्पर या टिन/एस्बेस्टस के शेड में भी बनाया जा सकता है। अब तो इंडियन वेटरनरी रिसर्च इंस्टीट्यूट के वैज्ञानिकों अधिक तापमान सहन करने वाली जयगोपाल नामक ऐसी देशज प्रजातियां विकसित कर ली है जिनसे वर्मी कंपोस्ट बनाने के लिए पेड़ों की छांव ही काफी होता है।
कुटीर उद्योग के रूप में भारी संभावना

जैविक खेती के प्रति बढ़ती रुझान और जैविक खाद की बढ़ती मांग के मद्देनजर वर्मी कंपोस्ट की कुटीर उद्योग के रूप में भारी संभावना है। गढ्ढे में गोबर की भराई, तापमान और नमी के नियंत्रण के लिए नियमित अंतराल पर पानी के छिडक़ाव, तैयार खाद को छानने, पैंकिंग और परिवहन के लिए लोगों की जरूरत होती है। इससे गांव के स्तर पर रोजगार बढ़ेगा। गोबर और अन्य अपशिष्ट पदार्थो का खाद बनाने में प्रयोग होने से पर्यावरण भी शुद्ध होगा। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्वच्छ भारत मिशन में भी मददगार होगा।
मुख्यमंत्री बनने के साथ ही योगी ने दिया अपनी सोच को विस्तार

उस समय उन्होंने बताया था कि अगर किसानों को वर्मी कंपोस्ट की खूबियों से वाकिफ कराया जाय तो यह गांव में कुटीर उद्योग का दर्जा ले सकता है। उनके अनुसार ऐसा हो तो इधर-उधर बिखरे गोबर के बेहतर सदुपयोग के नाते साफ-सफाई होने से पर्यावरण भी संरक्षित रहेगा। 
मुख्यमंत्री बनने के बाद ही उन्होंने इस संभावना पर काम भी किया। हर न्यायपंचायत स्तर पर वर्मी कंपोस्ट की इकाई के लिए अनुदान दिया गया। वह बार-बार कहते हैं कि गोशालाएं वर्मी कंपोस्ट और गो आधारित अन्य उत्पादों से आत्म निर्भर हो सकती हैं। हमीरपुर जिलों को जैविक खेती का मॉडल बनाने, हर मंडी में जैविक उत्पादों के लिए अलग जगह मुकर्रर करने, गो आधारित जीरो बजट की खेती को बढ़वा देने की योजना के पीछे भी उनकी यही सोच है।
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केंचुआ खाद में प्राप्त पोषक तत्व फीसद में

जैविक कार्बन 9.15-17.78

नाइट्रोजन 2-2.8

फास्फोरस 1.2-2.5

पोटैशियम 0.15-0.60

सोडियम 0.6-030

कैल्शियम 22.67-70

मैग्नीश्यिम 22.67-70

इसके अलावा प्रति 100 ग्राम में कापर, लोहा, जिंक और सल्फर की मात्रा क्रमश: 2-9.5, 2-9.3, 5.7-11.4 और 129-550 मिलीग्राम होती है।

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