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बुधवार, 8 सितंबर 2021

समग्र व विविध आयामी शिक्षा की आवश्यकता: प्रो. सुरेंद्र पाठक ★ सभ्यता, संस्कृति, विधि, व्यवस्था और शैक्षिक अनुशासन पर विशेष व्याख्यान

समग्र व विविध आयामी शिक्षा की आवश्यकता:  प्रो. सुरेंद्र पाठक

★ सभ्यता, संस्कृति, विधि, व्यवस्था और शैक्षिक अनुशासन पर विशेष व्याख्यान

महू। भारतीय सनातन परंपरा में ज्ञान, विवेक और विज्ञान का अंतर संबंध रहा है, यही सभ्यता, संस्कृति, विधि, व्यवस्था का अंतर संबंध है। मानव जाति में समझने और समझ कर जीने की परंपरा रही है। मानव में समझने के लिए परंपरागत अनुभव और विचार परंपरा ही शिक्षा, शोध, अनुसंधान के रूप में है। जिसमें दर्शन, विचारधाराएं और मीमांसाओं का प्रकटन-प्रकाशन हुआ है। इसी प्रकार मानव में जीने के दो आयाम हैं व्यवहार और व्यवसाय के। मानव परंपरा में व्यवहार मानव में संबंध की पहचान, संबंधों में निहित न्याय पूर्ण अपेक्षाओं के निर्वाह के रूप में पांच स्तर पर मानव जाति में व्याप्त है जो व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र व अंतराराष्ट्र तक फैला है। इसकी एकसूत्रता व समरसता ही अखंड समाज की रचना संभावनाओं को जन्म देती है। इसी प्रकार व्यवसाय आयाम का संबंध मानव शरीर के पोषण व संरक्षण के लिए है। जिसके लिए उत्पादन और अर्थोपार्जन की व्यवस्था रही हैं। अर्थ का उत्पादन विधि, प्रक्रियाबद्ध तरीके से प्राकृतिक नियमों के साथ होना नियम पूर्ण उत्पादन के रूप में विज्ञान सम्मत कार्य है।
उक्त विचार सागर विश्वविद्यालय के एलुमनी डॉ सुरेंद्र पाठक जीवन विद्या विशेषज्ञ ने विशेष व्याख्यान के रूप में डा. बी आर अंबेडकर सामाजिक विज्ञान विश्वविद्यालय, महू में संकाय सदस्यों के समक्ष प्रस्तुत किए। जिसका आयोजन ब्राउस के प्रबंधन विज्ञान अध्ययनशाला के द्वारा संकाय भवन में 7 सितंबर को सायंकाल किया गया ।
पाठक ने कहा कि शिक्षा और शैक्षिक अनुशासनों/विषयों के अंतर्संबंध और वर्गीकरण का आधार भी परंपरागत रूप से आयामों का सहअस्तित्व रहा है। आज  शैक्षिक ज्ञान का विवेक सम्मत होना अर्थात व्यवहार शिक्षा से जोड़ना तथा विज्ञान तकनीकी व इंजीनियरिंग का विवेक सम्मत होना समय की आवश्यकता है। प्राकृतिक संतुलन के अर्थ में विवेक सम्मत विज्ञान ही भविष्य में प्रचलित विज्ञान दिशा को स्पष्ट करेगा। उन्होंने यह भी कहा कि नई शिक्षा नीति के दिशानिर्देशों में ऐसे ही कुछ संकेत मिलते हैं। ये विचार मध्यस्थ दर्शन सहअस्तित्ववाद पर आधारित हैं। जिसका प्रतिपादन अमरकंटक मध्यप्रदेश के अनुसंधानकर्ता वेदमूर्ति श्री ए नागराज जी ने किया है। श्री नागराज जी ने अस्तित्व मूलक मानव केंद्रित चिंतन के रूप में चार दर्शन, तीन वाद और 3 शास्त्रों की रचना कर ज्ञान परंपरा में अप्रतिम योगदान किया है। जिसको शिक्षा से जोड़ा जा सकता है क्योंकि यह ज्ञान प्रमाण आधारित है।
कार्यक्रम का संचालन प्रबंधन विज्ञान अध्ययन शाला के प्रभारी डॉ भरत भाटी ने किया। विशेष व्याख्यान में विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. आशा शुक्ला,  रजिस्टर डॉ अजय वर्मा, अधिष्ठाता डॉ डी. के. वर्मा प्रो. देवाशीष देवनाथ, डा. मनीषा वर्मा के अतिरिक्त विभिन्न संस्थाओं के अध्यक्ष और इंदौर के गणमान्य नागरिक भी शामिल थे विशेष व्याख्यान का प्रसारण ऑनलाइन भी किया गया।

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