रविवार, 8 दिसंबर 2019

आध्यात्म एवं विज्ञान के समन्वय होगा सर्वोदय: स्वामी परमानन्द जी, अद्वैत उत्सव में पूर्व सीएम शिवराज चौहान का संम्मान

आध्यात्म एवं विज्ञान के समन्वय होगा सर्वोदय: स्वामी परमानन्द जी,
अद्वैत उत्सव में पूर्व सीएम शिवराज चौहान का संम्मान
सागर। महामण्डलेष्वर स्वामी परमानन्द गिरी जी महाराज ने कहा कि आज कल्याण के सभी साधन सुलभ हैं। विज्ञान ने सारी सुविधाएँ दी हैं लेकिन विज्ञान के कारण ही बर्बाद भी हो सकते हैं। जब आध्यात्म और विज्ञान मिलते हैं तभी सर्वोदय होता है। यदि विज्ञान और राजनीति मिल जाये ंतो सर्वनाष भी हो सकता है। आज राजनीतिक हाथों में आणविक शक्ति होने का असर हमें देखने को मिल रहा है। महामण्डलेष्वर स्वामी परमानन्द गिरी महाराज ने डाॅ. हरीसिंह गौर वि. वि., सागर और संस्कृति विभाग, मध्यप्रदेष द्वारा  संयुक्त रूप से आयोजित तीन दिवसीय अद्वैत उत्सव के उद्घाटन सत्र में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। उन्होंने कहा कि सन्तों के हाथ में ही शस्त्र होने चाहिए। विज्ञान भी एक शस्त्र है। 
अद्वैत सिद्धान्त का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि द्वैत एवं अद्वैत एक दूसरे से जुड़े हैं। द्वैत नहीं है तो अद्वैत को कैसे देखेंगे। उन्होंने कहा कि अद्वैत ही व्यक्ति को आत्मावान बनायेगा और भारत को विष्वगुरू के रूप में स्थापित करेगा।
 अद्वेतवाद आज भी प्रासंगिक:सुरेश सोनी
 सत्र के मुख्य वक्ता सुरेष सोनी ने कहा कि सामाजिक जीवन में अद्वैत का ज्ञान कैसे बढे़, आज इस बात पर चिंतन करने की आवष्यकता है। विष्व भर में बढ़ रही समस्याओं के हल के लिए अद्वैत का सिद्धान्त आज अधिक प्रासंगिक है। समाज में विभेद की दृष्टि होने के कारण ही समस्यायें पैदा हो रही हैं। हमनें प्रकृति को भोग्य मानकर इसका दोहन किया लेकिन हमारे यहाँ प्रकृति के साथ एकात्मता का भाव था। एकात्मता का यह चिंतन आध्यात्म, अर्थषास्त्र, कला एवं समाज शास्त्र में दिखता भी है। आज आवष्यकता इस बात की है कि भारत अद्वैत सिद्धान्त के आधार पर सम्पूर्ण विष्व को दिषा और व्यवहार का दर्षन दे।
 
अद्वैत भारत की माटी और जड़ों में है: शिवराज सिंह
 पूर्व मुख्यमंत्री  षिवराज सिंह चैहान ने कहा कि अद्वैत भारत की माटी और जड़ों में है। 'सियाराम में सब जग जानी' ये विचार हमारे यहाँ प्राचीन समय से ही चला आ रहा है। समस्त विद्वतजन इस विचार को ही समाज में भेद-भाव को मिटाने वाला बताते हैं। सारी दुनिया एक परिवार है यही अद्वैतवाद है। धर्म की जय हो, अधर्म का नाष हो, प्राणियों में सद्भावना हो विष्व का कल्याण हों यही अद्वैतवाद हैै। यह सबकी मंगल की कामना करने वाला सिद्धान्त है। 
पूर्व केन्द्रीय मंत्री डाॅ. सत्यपाल सिंह ने कहा कि  भारतीय दर्षन परम्परा की जितनी भी अवधारणाएँ हैं वे कहीं न कहीं ईष्वर के अस्तित्व को ही प्रमाणित करती हैं। प्रकृति मानव अस्तित्व में कितनी महत्त्वपूर्ण है यह सिद्ध करने के लिए बताया कि ब्रह्म सभी जगह विद्यमान है। सत्य से साक्षात्कार करना है तो आवरण हटाना होगा ।
जगत पूज्य है, भोग नहीं:
  स्वामी परमात्मानंद सरस्वती ने कहा कि आज विष्व आर्थिक और धार्मिक एवं सांस्कृतिक युद्ध से जूझ रहा है। स्वयं को सर्वश्रेष्ठ बताने की होड़ है। आज आवष्यकता है कि हम किसी एक सिद्धान्त को मानें परन्तु सम्मान समस्त सिद्धान्तों का करें। उन्होंने बताया कि जब हम यह कहते हैं कि 'ब्रह्म सत्य, जगत मिथ्या' तब मिथ्या से हमारा अभिप्राय इसके शाब्दिक अर्थ से नहीं होता। नामरूप मिथ्या वस्तु की सत्यता से ही सम्बन्धित है। मिथ्या का आधार ही सत्यता से है। 
मानव और प्रकृति के बीच समन्वय है अद्वेत:कुलपति
 कुलपति प्रो. राघवेन्द्र प्रसाद तिवारी ने कहा कि अद्वैत वेदान्त दर्षन ने भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विकास में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया है और मानव एवं प्रकृति के बीच एक सामंजस्य स्थापित करने में भी इस दर्षन की महती भूमिका रही है। अद्वैत उत्सव 2019 के समन्वयक एवं प्रख्यात दर्षनाचार्य प्रो. अम्बिकादत्त षर्मा जी ने अद्वैत उत्सव के आयोजन की भूमिका पर प्रकाष डालते हुए कहा कि विष्व में जितने भी दर्षन अस्तित्व में हैं, उनमें से सर्वश्रेष्ठ दर्षन है अद्वैत वेदान्त का दर्षन जो सार्वभौमिक एकात्मता(न्दपअमतेंस व्दमदमेे) को विषिष्ट रूप से प्रतिपादित करता है।
इनका हुआ सम्मान 
कार्यक्रम में चिन्मय इंटरनेषनल फाउंडेषन, वेलियानाड, केरल, आर्ष विद्या गुरुकुलम, अनाईकट्टी, तमिलनाडु, अद्वैत शारदा, श्रृंगेरी शारदा पीठ, कर्नाटक, अद्वैत आश्रम, रामकृष्ण मिषन, मायावती, उत्तराखण्ड, आदि शंकर ब्रह्म-विद्या पीठ, सोमाश्रम, उत्तरकाषी(हिमालय), पूर्व मुख्यमंत्री  षिवराज सिंह चैहान और सुप्रसिद्ध चित्रकार वासुदेव कामथ, मुम्बई को अद्वैत सिद्धान्त के प्रचार-प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान के लिए  सम्मानित किया गया।
आभार प्रभारी कुलसचिव संतोष सोहगौरा ने व्यक्त किया। संचालन श्री विनय उपाध्याय ने किया।
प्रथम सत्र
प्रथम तकनीकी सत्र षंकराचार्य जी के जीवन, दर्षन एवं मठामनाय परम्पराओं पर केन्द्रित था। इस सत्र की अध्यक्षता स्वामी परमात्मानन्द सरस्वती जी ने की तथा मुख्य वक्ता थे डाॅ. बलदेवानंद सागर। सागर जी ने अपने वक्तव्य में शंकराचार्य की जीवन की मुख्य बातें बताते हुए कहा कि आठ वर्ष की आयु में शंकराचार्य को चारों वेदों का ज्ञान, 12 वर्ष की आयु में शास्त्र ज्ञान तथा 16 की आयु में शंकर भाष्य रचना कर दी। मात्र 32 वर्ष की आयु में उन्होंने मोक्ष प्राप्ति की परन्तु इस छोटे से जीवनकाल में उन्होंने 4 प्रमुख मठों की स्थापना की जो कि आज भी वैदिक परम्पराओं और वैदिक दृष्टि के गढ़ हैं।  
परमात्मानंद सरस्वती जी ने हिन्दू दृष्टि के बारे में बात करते हुए इस बात पर जोर दिया कि हिन्दू दृष्टि व्यक्ति केन्द्रित नहीं अपितु धर्म केन्द्रित है। हिन्दू जीवन शैली परमसत्य दर्षन का मार्ग है जो कि पष्चिमी धर्म की अवधारणा द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता।
दूसरा सत्र
द्वितीय तकनीकी सत्र षंकराचार्य के अद्वैत वेदान्त के पूर्व एवं पष्चात दार्षनिक विकास पर केन्द्रित था। इस सत्र की अध्यक्षता स्वामी समवित सोमगिरी जी ने की तथा वक्ता थे श्री मुकुल कानितकर एवं डाॅ. महेश चंद्र षर्मा जी। श्री कानितकर जी ने अपने वक्तव्य में स्वामी विवेकानन्द जी का संदर्भ देते हुए कहा कि कैसे पष्चिमी ज्ञान परम्परायें सनातन ज्ञान परम्परा से भिन्न हैं। भारतीय ज्ञान परम्परा में एकात्म दृष्टि को अपने जीवन में आत्मसात करके परम्परागत रूप से अद्वैतवाद स्थापित करने को संस्कार कहते हैं। किसी भी परिवर्तन का आधार विचार और स्वाध्याय होना चाहिए। तमाम विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारत यदि सदियों से अपने अस्तित्व को संजो पाया है तो उसका मुख्य कारण है कि धर्म हमारे आचरण एवं व्यवहार का हिस्सा है। 
डाॅ. महेष चंन्द्र षर्मा जी कहा कि भारतीय राजनीति में पष्चिमी राजनीति का असर दिखायी देता है। इसीलिए शंकराचार्य एवं उनके कार्य हमारे लिए प्रेरणास्रोत हैं। 
स्वामी समवित सोमगिरी जी ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि प्रत्येक व्यक्ति अनंत की यात्रा पर अग्रसर है और यदि उसकी दृष्टि वैदिक ज्ञान से पुष्ट नहीं है तो उसका भटकना तय है। ब्रह्म ज्ञान सब को हो सकता है यदि उसकी दृष्टि ठीक है। 
कलाकृतियों कीप्रदर्शनी
कार्यक्रम स्थल पर अद्वैत सिद्धान्त को प्रतिपादित करते हुए कलाकृतियों एवं पुस्तकों की प्रदर्षनी भी आयोजित की गई है। संगोष्ठी में देष-विदेष के तीन सौ से अधिक विद्वान प्रतिभागी, चित्रकार एवं रंगकर्मी प्रतिभागिता कर रहे हैं।
ये रहे मौजूद
कार्यक्रम में पूर्व गृहमंत्री भूपेंद्र सिंह,विधायक शेलेन्द्र जैन ,प्रदीप लारिया,सुधीर यादव, सहित अनेक नागरिक गण उपस्थित थे।

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