एससी प्रमाण पत्र पर नियुक्ति के आरोप में डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय के कॉमर्स विभाग के डीन निलंबित
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी की रिपोर्ट के बाद कार्रवाई, विश्वविद्यालय ने शुरू की अनुशासनात्मक कार्यवाही
सागर। डॉ. हरीसिंह गौर केंद्रीय विश्वविद्यालय, सागर में अनुसूचित जाति (SC) प्रमाण पत्र के आधार पर नियुक्ति प्राप्त करने के आरोपों से घिरे बिजनेस मैनेजमेंट विभाग के प्रोफेसर डॉ. श्री भागवत (Shree Bhagwat) को विश्वविद्यालय प्रशासन ने तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। डॉ. भगवान वर्तमान में स्कूल ऑफ कॉमर्स एंड मैनेजमेंट के डीन के पद पर कार्यरत थे।
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विश्वविद्यालय द्वारा 7 अगस्त 2026 को जारी कार्यालय आदेश के अनुसार, डॉ. भागवत की प्रारंभिक नियुक्ति 16 अप्रैल 2005 को अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित पद पर लेक्चरर के रूप में हुई थी। उनके द्वारा प्रस्तुत एससी प्रमाण पत्र को लेकर शिकायतों के बाद विश्वविद्यालय ने फैक्ट फाइंडिंग कमेटी गठित की थी।
कमेटी ने बताई ये प्रारंभिक बातें
विश्वविद्यालय के आदेश में कहा गया है कि 30 जुलाई 2026 को गठित फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने 5 अगस्त को अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत की। कमेटी के रिकॉर्ड परीक्षण में प्रथम दृष्टया पाया गया कि—
- डॉ. भागवत की नियुक्ति अनुसूचित जाति वर्ग के लिए आरक्षित पद पर हुई थी।
- रिकॉर्ड में सक्षम प्राधिकारी द्वारा जारी वैध स्थायी एससी प्रमाण पत्र उपलब्ध नहीं मिला।
- उनके द्वारा प्रस्तुत प्रमाण पत्र का संबंधित जारीकर्ता प्राधिकारी के रिकॉर्ड से सत्यापन नहीं हो सका।
- संबंधित प्राधिकारियों से प्राप्त सत्यापन रिपोर्ट में प्रथम दृष्टया डॉ. भागवत के उत्तर प्रदेश की बिंद समुदाय, जिसे वहां अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) श्रेणी में बताया गया है, से संबंधित होने की बात सामने आई।
- कमेटी ने प्रथम दृष्टया माना कि एससी आरक्षण के आधार पर नियुक्ति अमान्य अथवा गलत जाति दावे पर प्राप्त किए जाने की आशंका है।
अनुशासनात्मक कार्रवाई की सिफारिश
फैक्ट फाइंडिंग कमेटी ने मामले में अनुशासनात्मक कार्यवाही शुरू करने की सिफारिश की थी। साथ ही, यदि सक्षम प्राधिकारी यह संतुष्ट होता है कि नियुक्ति गलत जाति दावे के आधार पर प्राप्त की गई थी तो अनुशासनात्मक कार्यवाही लंबित रहने तक निलंबन सहित आवश्यक कार्रवाई की अनुशंसा की गई।
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विश्वविद्यालय प्रशासन ने रिपोर्ट पर विचार करने के बाद आरोपों को गंभीर और कर्मचारी की एससी आरक्षित पद पर नियुक्ति की पात्रता से जुड़ा हुआ माना। आदेश में यह भी कहा गया कि डॉ. भगवान के डीन पद पर बने रहने से अनुशासनात्मक जांच प्रभावित होने की आशंका हो सकती है।
जांच पूरी होने तक निलंबन
विश्वविद्यालय ने केंद्रीय सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1965 के तहत डॉ. श्री भागवत को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया है। निलंबन अवधि में उनका मुख्यालय डॉ. हरीसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर रहेगा और वे सक्षम प्राधिकारी की लिखित अनुमति के बिना मुख्यालय नहीं छोड़ सकेंगे।
उन्हें नियमानुसार निर्वाह भत्ता और अन्य अनुमन्य भत्ते मिलेंगे। साथ ही, बिना पूर्व अनुमति विश्वविद्यालय के किसी कार्यालय या प्रशासनिक अनुभाग में प्रवेश पर भी रोक रहेगी, सिवाय अनुशासनात्मक कार्यवाही के संबंध में आवश्यकता होने पर।
अंतिम निर्णय अनुशासनात्मक जांच के बाद
विश्वविद्यालय के आदेश में स्पष्ट किया गया है कि यह कार्रवाई प्रारंभिक (prima facie) निष्कर्षों के आधार पर की गई है। मामले में अनुशासनात्मक कार्यवाही पूरी होने के बाद अंतिम निर्णय विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद (Executive Council) द्वारा लिया जाएगा।
प्रो. भागवत का पक्ष:
इस कार्रवाई पर अपना पक्ष रखते हुए डॉ. भागवत ने कहा, "मैं लगातार विवि में हो रही गड़बड़ियों और गलतियों के खिलाफ बोलता रहा हूँ। इसीलिए बदले की भावना के तहत यह कार्रवाई की गई है। इस द्वेषपूर्ण कार्रवाई में केवल 8 दिनों के भीतर सारी प्रक्रिया पूरी कर ली गई और मेरा पक्ष तक नहीं सुना गया।"
अन्य नियुक्तियों की शिकायतों पर उठते सवाल
इस निलंबन के बाद विवि प्रशासन की कार्यप्रणाली पर भी सवाल खड़े हो रहे हैं। आमतौर पर महीनों और सालों तक फाइलों को दबाकर रखने वाला प्रशासन इस मामले में मात्र 8 दिनों के भीतर जांच से लेकर निलंबन तक की प्रक्रिया पूरी करने में 'एक्सप्रेस रफ्तार' से चला।







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