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रविवार, 4 अक्तूबर 2020

फिर वो भरोसा टूटने की कहानी याद आयी.... @ ब्रजेश राजपूत ,ग्राउंड रिपोर्ट

फिर वो भरोसा टूटने की कहानी याद आयी....

@ ब्रजेश राजपूत ,ग्राउंड रिपोर्ट 

वो छह दिसंबर 1992 की दोपहर थी, सुबह से ही दफ़्तर यानिकी दैनिक जागरण के नोएडा के संपादकीय में सरगर्मी थी, हाल ही में मैंने यहां भोपाल से आकर उपसंपादक के पद पर काम करना शुरू किया था। मेन डेस्क यानिकी अखबार के पहले पन्ने में जाने वाली खबरों को जहां कांटा छांटा यानिकि संपादन और अंग्रेजी से आयी खबरों का अनुवाद किया जाता है वहां कई सारे काम करने वालों में भी था। आज अयोध्या में कारसेवा का दिन था। हमारे अखबार का मुख्य कार्यालय कानपुर में था और ये अखबार मूल रूप से उत्तरप्रदेश का था इसलिये दिल्ली से निकलने वाले अखबारों से बेहतर नेटवर्क यूपी में था। यही इस अखबार की दिल्ली में पहचान भी थी।
उस दिन हम सब बेहद तनाव में थे। टेलीपिं्रटर से लगातार कारसेवकों के अयोध्या में विवादित स्थल तक पहुंचने की खबरें आ रहीं थीं। ये भीड क्या करेगी कोई नहीं जानता था। मगर अयोध्या में तैनात पीएसी की 35 और सीआरपीएफ की 4 कंपनियों की तैनाती आश्वस्त कर रही थी कि ऐसा कोई काम नहीं होगा जिससे दुनिया में देश को और सरकारों को नीचा देखना पडे। मगर दोपहर होतेे होते हालात बिगडने लगे और टेलीप्रिंटर पर खबरें आने लगीं। कारसेवकों ने बैरिकेड तोडे, कारसेवक विवादित ढांचे की तरफ बढे और थोडी देर बाद ही वो विवादित ढांचा तोडा जाने लगा। उन दिनों ना तो समाचार चैनलों की ऐसी बाढ थी और ना ही मोबाइल फोन का जमाना। संवाददाता फोन और फैक्स से ही जानकारियां भेजते थे। जो दफतरों तक पहुंचती थी। दफतर में सरगर्मी बढ गयी जो हुआ उसके बारे में सोचा भी नहीं गया था। हमारे साथ काम करने वालों में कुछ खुश थे तो कुछ सदमें में थे कि हे भगवान ये क्या हो गया।
प्रबंधन ने जल्दबाजी में एक बैठक बुलायी और तय किया कि अगले दिन के अखबार से पहले भी शाम के लिये भी अखबार निकाला जाये। बस फिर क्या था हम सब अपना विशाद और सदमा भुला कर लग गये शाम के अखबार के लिये खबरें बनाने संजोने। अयोध्या में इतनी हडबडी थी कि हमारे संवाददाता मुश्किल से फोन तक पहुंच पा रहे थे और हांफते परेशान होते जो वो बोल रहे थे हम उसे कागज पर उतार रहे थे। ब्यौरा सुनते वक्त कोई प्रतिप्रश्न या ओर जानकारी लेने का सवाल ही नहीं उठता था। क्योंकि जो मिल रहा था वो कितनी मुश्किलों से आ रहा था हम जानते थे। कुछ घंटों में ही शाम का अखबार तैयार था। जिसमें ढांचे के गिरते की तस्वीरें और ब्यौरा विस्तार से लिखा गया था। नोएडा में अखबार के दफतर के बाहर हाकर्स की भारी भीड थी इस शाम के अखबार को लेकर बांटने की। ये अखबार खूब बिका। देश दुनिया की ये सबसे बडी खबर थी कि बीजेपी नेताओं की उपस्थिति में सैंकडों साल पुराना विवादित ढांचा गिरा दिया गया।
अयोध्या में ढांचा गिरा मगर बीजेपी ने उंचाई पा ली ये आने वाले सालों में हम सबने देख लिया। 1984 में तब की दो सांसदों वाली बीजेपी, 1991 की दसवीं लोकसभा में 120 सांसदों वाली पार्टी थी मगर आज की सत्ररहवी लोकसभा में पार्टी के पास 303 सांसद हैं। यानिकी 28 सालों में पार्टी ने 183 सांसदों वाली मजबूत और अपने दम पर सरकार बनाने वाली पार्टी बन गयी है। ये अलग बात है कि 1992 में अयोध्या से राम रथ लेकर चलने वाले नेता अब सारे हाशिये पर हैं। लालकृश्ण आडवाणी, मुरली मनोहर जोशी, कल्याण सिहं और उमा भारती सहित 32 लोगों को बाबरी विध्वंस केस में आरोपी बनाया गया था। पार्टी में नये नेताओं मोदी और शाह की पौध आ गयी है जो पुराने नेताओं से अलग सोचती और काम करती है। पिछले दिनों जब विध्वंस केस में सीबीआई का फैसला आया तो उस जमाने के धुरंधर और मंदिर वहीं बनायेंगे का नारा लगाने वाले दिग्गज नेता जब आरोपी बनकर सीबीआई की अदालत में पेश हुये तब भी वैसा ही अप्रत्याशित परिणाम आया जैसा छह दिसंबर को मिला था। यानिकी ऐसा सोचा नहीं था कि 28 साल की लंबी जांच के बाद भी सारे आरोपी बरी हो जायेगे। खैर ये हमारी न्याय प्रणाली की कमजोरी है कि भीड तंत्र को कसने के लिये कोई कानून नहीं हैं। कोर्ट के फैसले को पढें तो ये सारे लोग अयोध्या में आयी भीड तंत्र के शिकार हुये। कोर्ट ने कहा कि विध्वंस के लिये कोई षडयंत्र नहीं हुआ और इन नेताओं में अधिकतर ढांचे को बचाना चाहते थे। मगर अंत भला तो सब भला मगर इन आरोपियों में से जिनमें से अधिकतर बेहद उम्रदराज हैं ओर जिन्होंने 28 साल तक जांच और केस का तनाव झेला उसका जिम्मेदार कौन होगा ये सवाल सबके सामने हैं।
सवाल तो उस दरम्यान ये भी उठा कि जब ढांचा टूट रहा था तो हमारे देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिंह राव क्या कर रहे थे। बहुत सारी बातें उस वक्त आयीं कि राव साहब सोने चले गये थे किसी ने बताया कि वो पूजा करने चले गये थे किसी ने उनको अपने कमरे में बंद बताया था। मगर इन सारे सवालों का प्रामाणिक जबाव विनय सीतापति की किताब हाफ लायन में है जिसका अनुवाद आधा शेर के नाम से मौजूद है। विनय लिखते हैं कि राव के सोने की बात एकदम गलत है। सवा बारह बजे जब पहले गुंबद पर हमला हुआ तब राव अपने अधिकारियों से बात कर रहे थे। मगर कुछ देर बाद जब टीवी पर उन्होंने जो कुछ देखा उसके बाद वो सामान्य नहीं रह पाये कुछ मिनटों तक वो किसी से बात नहीं कर पाये, कुछ बोल नहीं सके, उन्हें उन सभी लोगों पर बहुत भरोसा था।
हमारे देश का इतिहास भरोसे टूटने की कहानियों से भरा है। बाबरी मसजिद ध्वंस और उसके बाद आया ये फैसला भी उन कहानियों में जुड गया है।

★  ब्रजेश राजपूत, एबीपी न्यूज़ नेटवर्क भोपाल


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