रविवार, 22 मार्च 2020

कमलनाथ जंबूरी मैदान के मंच से सीएम हाउस के पंडाल तक @ब्रजेश राजपूत/सुबह सबेरे में ग्राउंड रिपोर्ट

कमलनाथ जंबूरी मैदान के मंच से सीएम हाउस के पंडाल तक 
@ब्रजेश राजपूत/सुबह सबेरे में ग्राउंड रिपोर्ट 
दृश्य एक -  वो सत्रह दिसंबर 2018 की गुनगुनी दोपहरी थी, जब भोपाल के बाहर जंबूरी मैदान पर उंचा मंच सजा था और उस मंच पर मध्यप्रदेश के सत्ररहवें मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ले रहे थे 72 वर्पीय कमलनाथ। इस मंच पर देश भर के राजनेता अतिथि के तौर पर इस क्षण का गवाह बनने आये हुये थे जिनमें बहुत खास थे कांग्रेस के तत्कालीन अध्यक्ष राहुल गांधी और यूपीए के अनेक नेता। मगर मंच का खास आकर्पण बने थे हरी बिना बांह की जैकेट पहने हुये कांग्रेस के नौजवान नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया और इसी मंच पर एक मौका ऐसा आया जब सिंधिया के सामने माफ करो महाराज हमारा नेता शिवराज का नारा देने वाले शिवराज ही आ गये। बस फिर क्या था एक यादगार फोटो बन गया उस दिन का जिसमें शिवराज के एक तरफ सिंधिया और एक तरफ कमलनाथ खडे थे और तीनों एक दूसरे का हाथ थामे थे। हमारे देश के लोकतंत्र में संभव है कि अलग अलग विचारधारा वाली पार्टियों से चुनाव मैदान में उतरे लोग बाद में एक साथ बैठकर जनता के हित में सरकारें चलाते हैं। इन तीनों नेताओं की ये तस्वीर बता रही थी अब प्रदेश सरकार सही दिशा में चलेगी क्योंकि सत्ताधारी दल का एक युवा नेता और एक अनुभव से भरे राजनेता के साथ सार्थक विपक्ष की भूमिका वो नेता निभाने के लिये हाथ मिलाकर खडा था जो तकरीबन पिछले पंद्रह सालों से सरकार चला रहा था। 

दृश्य दो -  तारीख बीस मार्च 20202 जगह छह, श्यामला हिल्स भोपा यानिकी मुख्यमंत्री  निवास पर दोपहर के बारह बजने को थे। निवास के गेट के पास के मैदान पर लगे डोम के मंच पर एक सफेद कवर वाली अकेली कुर्सी रखी थी जिसके सामने की मेज पर अनेक माइक आईडी रखे गये थे। कुर्सी के ठीक पीछे बडा सा फलेक्स लगा था जिसमें कमलनाथ की बडी सी तस्वीर थी और स्लोगन लिखा था उम्मीदंे रंग लाई तरक्की मुस्कुराई। मगर फलेक्स के श्लोगन के ठीक उलट पंडाल में माहौल नाउम्मीदी का था। सामने एक तरफ लगी कुर्सियों पर कांग्रेस  के विधायक आ आकर बैठ रहे थे। ये वही विधायक थे जो कुछ दिन पहले जयपुर से लौटे थे और इन दिनों भोपाल के मेरियट होटल में डेरा डाले थे। विधायकों की कुर्सियों में पीछे की ओर आकर चुपचाप तरीके से आ बैठे थे दिग्विजय सिंह जो एक दिन पहले तक बेंगलुरू में थे और कांग्रेस से टूटे छिटके विधायकों से मिलने के लिये सत्याग्रह कर रहे थे। वो किसी से बात नही कर रहे थे हर मौके पर मीडिया के सवालों के हंस कर जबाव देने वाले दिग्गी राजा आज चुप थे और उनकी भाव भंगिमा बता 
रही थी कि वो बेहद थके और उदास हैं मगर दिग्गी राजा के छोटे भाई लक्ष्मण सिंह आगे की कुर्सी पर बैठ मीडिया के सवालों का जबाव उसी अंदाज में दे रहे थे जिस अंदाज के लिये वो जाने जातेहैं। बारह बजने के कुछ मिनिट बाद ही मुख्यमंत्री कमलनाथ आते हैं और सामने लगे मीडिया के कैमरों की तरफ मुस्कुराते हुये देखते हैं। कमलनाथ के चेहरे पर हमने ऐसी मुस्कान हमेशा आत्मविश्वास से भरी हुयी देखी है मगर आज रंग उतरा हुया था। वो अपने कुर्ते के जेब से तीन पेज का लिखा हुआ डाफट निकालते हैं और बोलना ाशुरू करते हैं। बडा ही भावनात्मक बयान देने के बाद वो कहते हैं कि मैं अब अपना इस्तीफा देने जा रहा हूं। बस इस एक लाइन को सुनते ही जहंा हम टीवी चैनल वाले ब्रेकिंग न्यूज बताने में लग जाते है मगर सामने बैठे कुछ विधायकों की आंखे गीली हो उठती हैं कमलनाथ के पीछे कतार में खडे उनके मंत्रिमंडल के अनेक युवा मंत्री भी भावुक हो उठते हैं। एक बडी ब्रेकिंग न्यूज के आते ही थोडी देर बाद ही ये मजमा खत्म हो जाता है। मंच के एक तरफ हाई टी का इंतजाम था मगर हमने वहां किसी विधायक नेता को जाते नहीं देखा। पर खबर कितनी ही बडी हो हम मेहनतकश पत्रकार चाय नाश्ते में परहेज नहीं करते तो उन स्टाल पर टीवी कू्र की भीड थी। कमलनाथ इस्तीफे का ऐलान कर जा चुके थे। 

इस राजनीतिक प्रहसन के दोनों दृश्यों के बीच तकरीबन चार सौ साठ दिन का ही फासला रहा। कमलनाथ जब जंबूरी मैदान पर अपनी पार्टी के अध्यक्ष और हजारों समर्थकों के सामने जब मुख्यमंत्री पद की शपथ ले रहे थे तब उन्होंने कम से कम अगले पांच साल तक का वक्त तो इस पद के लिये मुकर्रर किया ही होगा। मगर राजनीति की राह कितनी रपटीली होती है ये उन्होंने सोचा भी नही होगा जो लोग पंद्रह महीने पहले उनके साथ जंबूरी मैदान पर हाथ उठाकर फोटो खिंचवा रहे थे वो आज यहां नहीं थे। वो महाराज आठ दिन पहले 12 मार्च को शिवराज के साथ खचाखच भरे बीजेपी के दफतर में फोटो खिचवा रहे थे। कमलनाथ सरकार की विदाई ऐसी होगी किसी ने सोचा नहीं था। जब कमलनाथ आये थे तो उनके पास कई सालों का केंद्र की राजनीति करने का अनुभव था। यूपीए की सरकार में वो कई बार संकटमोचक की भूमिका में रहे। पीवी नरसिंह राव की अल्पमत की सरकार में भी वो फलोर मेनेजमेंट के लिये जाने जाते थे। देश के वो सारे नेता जो आज अपनी अपनी पार्टियों के अध्यक्ष बनकर बैठे हैं जिनमें शरद पवार से लेकर मायावती ममता बनर्जी अखिलेश यादवनवीन पटनायक उनसे कमलनाथ की दोस्ती के संबंध हैं। वो सीधा उनसे फोन लगाकर बात करते हैं। उनके पास संपर्क और सियासत का ऐसा अनुभव था जिसके सामने एमपी के सारे नेता बौने दिखते थे। उन्होंने प्रदेश में कांग्रेस सरकार की जब कमान संभाली तो लगा कि बीजेपी से कम वोट पाकर भी कांग्रेस ने सरकार तो बना ली है मगर इसे यदि कोई चला सकता है तो वो कमलनाथ ही थे क्योंकि राजनीतिक हल्के में उनका नाम मान सम्मान सब कुछ था। एक ब्रांड कमलनाथ था जिसका दिल्ली से लेकर दावोस तक में जिसका सिक्का चलता है कमलनाथ की ताकत का एक तिलस्म सा था जिसके आधार पर माना जाता था कि कमलनाथ है तो मुमकिन है। इस्तीफे से एक दिन पहले जब मुझे उन्होंने एबीपी न्यूज के लिये इंटरव्यू दिया तो मेरा पहला सवाल यही था कि कमलनाथ सरकार संकट में हैं और कमलनाथ के चेहरे पर शिकन नहीं है इस आत्मविश्वास का राज क्या हैं उस पर कमलनाथ मुस्कुराये और कहा था कि वो जो बेंगलुरू गये हैं वो मेरे अपने लोग हैं उनसे मरे संबंध है हमारा उनसे संपर्क है जब वो आयेंगे तो हमसे दूर नहीं जा सकते हमारी सरकार उनकी सरकार है जिसके लिये उन सभी ने मेहनत की है। मगर कमलनाथ जो कह रहे थे वो बीजेपी भी जानती थी इसलिये इन विधायकों को भोपाल आने ही नहीं दिया और रही सही कसर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने कर दी जिसने कहा कि इन विधायकों का भोपाल जाना जरूरी नहीं है। 
कहते हैं इतिहास अपने को दोहराता है तो कमलनाथ की सरकार ज्योतिरादित्य सिंधिया के पाले बदलने से गिरी वरना तो बीजेपी नेता तीन बार पहले भी आपरेशन लोटस कर चुके थे तो यदि आप इतिहास के पन्ने पलटे तो जानेंगे कि ज्योतिरादित्य सिंधिया की दादी विजयाराजे सिंधिया ने भी 1967 में कांग्रेस के एमएलए को पहले दिल्ली और फिर ग्वालियर ले जाकर सरकार गिरायी थी तब मुख्यमंत्री थे डीपी मिश्र और सरकार बनने के बाद सीएम बने थे गोविंदनारायण सिंह। मगर गोविंदनारायण सिहं भी लंबे समय तक मुख्यमंत्री नहीं रह पाये। विजयाराजे सिंधिया के सरकार में लगातार दखल देने से नाराज होकर उन्होने  भी उन्नीस महीने बाद ही इस्तीफा दे कर कांग्रेस में वापसी कर ली थी। वैसे इतिहास से सबक लेते रहना चाहिये मगर लोग लेते नहीं हैं। 
ब्रजेश राजपूत,एबीपी न्यूज, भोपाल

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