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शनिवार, 3 अक्तूबर 2020

राष्ट्रपति और कोरोना महामारी : हिदायतों के प्रति दिखाया अनादर @ प्रदीप कृष्णात्रे


राष्ट्रपति और  कोरोना महामारी : हिदायतों के प्रति दिखाया अनादर

  @  प्रदीप कृष्णात्रे

नेता का आम जन पर असर पड़ता है, खासतौर पर संकट के दौर में। कुछ ऐसे नेता होते हैं जो अपने कामों व उदाहरणों को सामने रखकर उम्दा नेतृत्व देते हैं। 
लीजिए अब अमेरिका के राष्ट्रपति भी कोरोना की चपेट में आ गए। ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन व ब्राज़ील के राष्ट्रपति बोल्सोनारो के बाद वे दुनिया के ऐसे तीसरे बड़े नेता हो गए हैं। 
दो लाख से ज्यादा मौतों के साथ संयुक्त राज्य अमेरिका विश्व में सबसे ज्यादा कोविड प्रभावित देश है। अगर यूरोप की बात करें तो यहाँ ब्रिटेन में सबसे ज्यादा चालीस हजार जानें गईं। वहीं एक लाख पैंतालीस हजार कोरोना मौतों के साथ ब्राज़ील लैटिन अमेरिका का सबसे संक्रमित देश है। 
आश्चर्यजनक रूप से दुनिया के अलग-अलग देशों के तीनों नेताओं में एक समानता है। तीनों ने लगातार उन्हें दी जाने वाली सलाहों को नकारा और ख़तरों से आगाह करने वाली हिदायतों के प्रति अनादर दिखाया। वे खुलेआम घूमते रहे, लोगों से हाथ मिलाते रहे, आमसभाओं को संबोधित करते रहे और मॉस्क पहनने से बचते रहे। वे  खुद को डॉन क्विक्जोट (प्रसिद्ध स्पैनिश उपन्यास का अदभुद् दुस्साहसी चरित्र) की तरह पेश करते रहे। अंतत: वायरस ने उन्हें जकड़ लिया। 
नेता का आमजन पर असर पड़ता है, खासतौर पर संकट के दौर में। कुछ ऐसे नेता होते हैं जो अपने कामों व उदाहरणों को सामने रखकर उम्दा नेतृत्व देते हैं। न्यूज़ीलैंड की प्रधानमंत्री व जर्मनी की चांसलर ऐसे नेताओं की पीढ़ी का प्रतिनिधित्व करती हैं। जब जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल के डॉक्टर को संक्रमण हुआ, उन्होंने खुद को क्वारेंटाइन कर लिया। 
भारत के प्रधानमंत्री नेताओं के अलग वर्ग का प्रतिनिधित्व करते हैं। उन्होंने विशेषज्ञों की सलाहों का गंभीरता के साथ अनुशरण किया। कम लोगों को याद होगा कि 24 मार्च को अपने टेलीविजन भाषण के आख़िर में उन्होंने लोगों को चेताया था कि यदि उन्हें कोविड संक्रमण के कोई लक्षण दिखें तो चिकित्सकों के परामर्श के बिना कोई दवा न लें। उन्होंने कहा था-इस मामले में कोई भी प्रयोग आपके जीवन को ख़तरे में डाल सकता है। 
उक्त तीनों संक्रमित नेता तीसरे वर्ग में हैं। इनमें से दो-बोल्सोनारो व ट्रंप तो ख़ुशी-ख़ुशी असावधान बने रहे। दोनों ने विज्ञान की अवधारणाओं को नकारा और अपनी महानता की डींगे हांकते रहे। ब्राज़ील के राष्ट्रपति ने तो इतनी चतुराई दिखाई कि अपने दो स्वास्थ्य मंत्रियों के इस्तीफ़े ले लिए। ट्रंप भी इनसे कम अहमक नहीं थे। उन्होंने हाइड्रोक्लोरोक्वीन दवा लेने की बात खुले तौर पर स्वीकारी जबकि विशेषज्ञ इसके खिलाफ राय देते रहे। जॉनसन ने उस अस्पताल में लोगों से हाथ मिलाने की शेखी बघारी जहाँ कोरोना मरीजों का इलाज किया जा रहा था। 
बोरिस जॉनसन पर शायद विशेषज्ञों की राय का असर हुआ। उन्हें भरोसा हो गया कि हर्ड इम्युनिटी विकसित होने पर वायरस का आक्रमण रुक जाएगा। इसके बाद जॉनसन ने लॉकडाउन और सोश्यल डिस्टेंसिंग की ज़रूरत को अस्वीकार किया। सात दिन अस्पताल में, जिसमें से तीन दिन सघन चिकित्सा इकाई (आइसीयू) में गुज़ारने को बाद उन्होंने कहा-'कुछ भी हो सकता था।' जब देश में कोरोना की दूसरी लहर आई तब उनमें वैसी हेकड़ी नहीं थी। 
बोल्सोनारो ने भी कोविड-19 को प्रारंभ में सामान्य फ्लू बताया। जब वे संक्रमण से मुक्त हो गए, जॉनसन की अपेक्षा ज्यादा दबंग नजर आए। कहने लगे-ब्राजील वालों को वैक्सीन लेने के लिए बाध्य नहीं करना चाहिए। ट्रंप चिड़चिड़े तो नहीं दिखे लेकिन वैसे ही तिरस्कारी रहे। उन्होंने यहाँ तक आरोप लगा दिया कि महामारी महज़ उनकी विरोधी डेमोक्रेटिक पार्टी का उन्हें राष्ट्रपति बनने से रोकने का झाँसा है। उन्होंने अपने इर्द-गिर्द लोगों के मॉस्क लगाने को नापसंद किया। एक पत्रकार वार्ता में तो संवाददाता से मॉस्क उतारने तक को कह दिया। रिपब्लिकन गवर्नर्स और अन्य ने उन्हीं की राह चलते हुए मॉस्क पहनने से परहेज़ किया। 
हालाँकि उम्र और वज़न ट्रंप का साथ नहीं दे रहा था। तीनों नेताओं में वे सबसे उम्रदराज़ (76 वर्षीय) हैं जबकि बोल्सोनारो 74 के व बोरिस 65 के हैं। ट्रंप न केवल 110 किलो वज़न के हैं बल्कि मोटापा के शिकार भी हैं। रोग नियंत्रण व प्रतिरोधक केन्द्र (CDC) के अनुसार 65 से 74 वर्ष की उम्र में अस्पताल में भर्ती होना भी जोखिम भरा होता है। 
अमेरिका के कई राष्ट्रपति संकटकाल में बीमार पड़े। विल्सन 1918-19 में तब इनफ्लुएंजा के शिकार हो गए थे जब दुनिया के कई हिस्सों में स्पैनिश फ्लू फैला था। अमेरिकी प्रशासन व विल्सन की पत्नी को इसका पता था लेकिन उन्होंने किसी को बताया नहीं। चार बार राष्ट्रपति रहे रूज़वेल्ट, विकलांगता से ग्रस्त थे। लड़ाइयों में कमजोरी के शिकार हुए और द्वितीय विश्वयुद्ध के ठीक बाद चल बसे। वैसे ही भारत के प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने चीन से युद्ध के बाद देह त्याग दी थी। सवाल है कि क्या ट्रंप और उनका प्रशासन क्या उनकी निर्बलता को लेकर ऐसा ही खुलापन दिखाता रहेगा ? 


(श्री प्रदीप कृष्णात्रे  नई दिल्ली स्थित जॉन हापकिन्स सेंटर फ़ॉर कम्युनिकेशन प्रोग्राम में रिसर्च व स्ट्रेटेजिक प्लानिंग के पूर्व निदेशक हैं ) 


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