दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला ,फार्मेसी कालेजो को राहत भरा: कालेज संचालकों को एकजुट होकर संघर्ष करना होगा
▪️वार्षिक रिन्यूअल, PERC वसुली और नो एडमिशन ईयर की नीति पर अदालत की सख्त टिप्पणी
तीनबत्ती न्यूज: 02 जून,2026
सागर: देशभर के फार्मेसी कॉलेजों के लिए राहत भरे एक महत्वपूर्ण फैसले में दिल्ली हाईकोर्ट ने फार्मेसी काउंसिल ऑफ इंडिया (PCI) को बड़ा कानूनी झटका दिया है। 29 मई 2026 को मुख्य न्यायाधीश देवेन्द्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तेजस करिया की खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि एक बार फार्मेसी एक्ट 1948 की धारा-12 के तहत किसी पाठ्यक्रम को अनुमोदन मिल जाने के बाद संस्थानों को हर वर्ष पुनः अनुमोदन ( Continuation Approval ) लेने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता। अदालत ने यह भी माना कि ऐसा करने का अधिकार PHARMACY ACT में कहीं भी प्रदान नहीं किया गया है। देशभर के फार्मेसी कॉलेजों की सामूहिक जीत बताया। उन्होंने कहा कि यदि PCI इस फैसले को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देती है, तो सभी संस्थानों को एकजुट होकर अपने अधिकारों की रक्षा के लिए आगे आना चाहिए। इस लड़ाई से जुड़े SLS कॉलेज ऑफ फार्मेसी सागर के संचालक अजय श्रीवास्तव और जिला अधिवक्ता संघ के पूर्व अध्यक्ष अंकलेश्वर दुबे और अन्य साथियों ने आज मीडिया को इसकी जानकारी दी।
कानून में नहीं तो PCI कैसे बना सकती है नियम ?
उन्होंने बताया कि अदालत में सुनवाई के दौरान PCI ने तर्क दिया कि COURSE और COURSE OF STUDY अलग-अलग अवधारणाएं हैं तथा प्रत्येक शैक्षणिक वर्ष को अलग COURSE OF STUDY मानकर वार्षिक अनुमोदन लिया जा सकता है। लेकिन हाईकोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि B.PHARM. D. PHARM या M.PHARM का पूरा कार्यक्रम ही COURSE OF STUDY है, उसका प्रत्येक वर्ष अलग कोर्स नहीं माना जा सकता। अदालत ने यहां तक टिप्पणी की कि यदि PCI का तर्क स्वीकार कर लिया जाए तो इसका अर्थ होगा कि B.PHARM का विद्यार्थी चार अलग-अलग COURSE OF STUDY कर रहा है, जो पूरी तरह अव्यावहारिक और कानून की भावना के विपरीत है।
निगरानी के नाम पर अवैध वसूली नहीं
फार्मेसी शिक्षण संस्थानों का एक बड़ा आरोप रहा है कि PCI ने निगरानी और गुणवत्ता नियंत्रण के नाम पर PERC शुल्क वसूलने तथा हर वर्ष अनुमोदन प्रक्रिया थोपने की परंपरा बना ली थी। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि PCI के पास पहले से ही धारा 12(3) के तहत जानकारी मांगने, धारा 16 के तहत निरीक्षण करने और धारा 13 के तहत अनुमोदन वापस लेने की पर्याप्त शक्तियां मौजूद हैं। इसलिए वार्षिक अनुमोदन की बाध्यता का कोई औचित्य नहीं बनता।
यह भी पढ़ें: सरकारी स्कूल के प्रिंसिपल को 10 हजार की रिश्वत लेते पकड़ा लोकायुक्त पुलिस ने
फार्मेसी शिक्षा क्षेत्र में बड़ा संदेश
इस फैसले को देशभर के हजारों फार्मेसी कॉलेजों के लिए राहत के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से संस्थान यह आरोप लगाते रहे हैं कि PCI ने अपने प्रशासनिक सर्कुलरों और हैंडबुक के माध्यम से ऐसे दायित्व थोप दिए थे जिनका आधार स्वयं PHARMACY ACT में नहीं है। अब दिल्ली हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि किसी भी वैधानिक संस्था को कानून से ऊपर जाकर नए दायित्व या आर्थिक भार लगाने का अधिकार नहीं है। यदि किसी संस्थान में कमियां हैं तो PCI को PHARMACY ACT की धारा 13 के तहत निर्धारित कानूनी प्रक्रिया अपनानी होगी, न कि हर वर्ष अनुमोदन रोकने या नो एडमिशन ईयर की धमकी देने की नीति।
यह भी पढ़ें: 50 हजार की रिश्वत लेते सरकारी कालेज के सहायक प्राध्यापक को लोकायुक्त ने पकड़ा : पोस्टिंग के नाम पर मांग रहा था 4 लाख
इस फैसले के बाद फार्मेसी शिक्षा जगत में एक बड़ा प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि आखिर वर्षों से बसले गए PERC शुल्क और वार्षिक अनुमोदन प्रक्रिया का कानूनी आधार क्या था ? यदि यह व्यवस्था कानून के अनुरूप नहीं थी, तो क्या देशभर के संस्थानों से वसूली गई रकम और लागू की गई प्रक्रियाओं की भी समीक्षा होगी? दिल्ली हाईकोर्ट का यह फैसला केवल एक अपील की हार नहीं, बल्कि फार्मेसी शिक्षा क्षेत्र में नियामकीय जवाबदेही और वैधानिक सीमाओं की पुनर्स्थापना के रूप में देखा जा रहा है। अब निगाहें PCI और केंद्र सरकार की अगली रणनीति पर टिकी हैं।
सभी कालेज एकजुट हो
इस ऐतिहासिक निर्णय पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए इस न्यायालयीन लड़ाई से जुड़े कॉलेज संचालक अजय श्रीवास्तव ने कहा कि, यह केवल स्स्स कॉलेज या कुछ संस्थानों की जीत नहीं, बल्कि देशभर के फार्मेसी कॉलेजों की सामूहिक जीत है। उनका कहना है कि पिछले दो वर्षों से यह कानूनी संघर्ष फार्मेसी शिक्षा क्षेत्र के हितों की रक्षा के लिए लड़ा जा रहा है और अभी यह लड़ाई समाप्त नहीं हुई है। उन्होंने आशंका व्यक्त की कि इस निर्णय को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दे सकती है, इसलिए सभी फार्मेसी संस्थानों को एकजुट होकर इस मामले में सहयोग करना चाहिए। उन्होंने कहा कि जब नियामक संस्थाएं कानून की सीमाओं से बाहर जाकर निर्णय लेने लगती हैं, तब न्यायपालिका ही संस्थानों के अधिकारों की अंतिम रक्षा करती है। उन्होंने देशभर के कॉलेज संचालकों, शिक्षकों और फार्मेसी शिक्षा से जुड़े सभी हितधारकों से अपील की कि वे इस संघर्ष को किसी एक संस्थान की लड़ाई न मानें, बल्कि फार्मेसी शिक्षा के भविष्य और संस्थानों के वैधानिक अधिकारों की रक्षा का अभियान समझकर इसमें अपना योगदान दें। उनका कहना था कि यदि पूरा फार्मेसी समुदाय एकजुट रहा तो किसी भी संस्था या प्राधिकरण के लिए मनमाने निर्णय थोपना आसान नहीं होगा।
-------------
---------
एडिटर : विनोद आर्य
________
---------------









0 comments:
एक टिप्पणी भेजें