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ढाई सौ साल पहले गुजरात से आए पूर्वज, सागर में आज भी गूंजते हैं उन्हीं के पारंपरिक गरबे • चकराघाट के मल्ली माता मंदिर में पीढ़ियों से दो ताली और तीन ताली के गरबों से हो रही देवी आराधना

ढाई सौ साल पहले गुजरात से आए पूर्वज, सागर में आज भी गूंजते हैं उन्हीं के पारंपरिक गरबे

• चकराघाट के मल्ली माता मंदिर में पीढ़ियों से दो ताली और तीन ताली के गरबों से हो रही देवी आराधना, आधुनिकता के बीच खेड़ावाल समाज ने सहेजी अपनी सांस्कृतिक पहचान


तीनबत्ती न्यूज:17 अक्टूबर, 2026

सागर: बदलते समय के साथ गरबा आयोजनों का स्वरूप भले ही आधुनिक संगीत, रोशनी और मनोरंजन के रंग में ढल गया हो, लेकिन सागर के चकराघाट स्थित श्री मल्ली माता मंदिर में नवरात्रि के दौरान आज भी गरबे का एक ऐसा पारंपरिक स्वरूप दिखाई देता है, जिसमें उत्सव से अधिक भक्ति और प्रदर्शन से अधिक आराधना का भाव है।

यहां गुजराती मूल के खेड़ावाल ब्राह्मण परिवारों के सदस्य अपनी आराध्य देवी की स्तुति में पारंपरिक गरबे गाते हैं और हथेलियों की दो ताली तथा तीन ताली की लय पर गरबा करते हैं। न तेज संगीत, न आधुनिक वाद्ययंत्र और न ही तड़क-भड़क—सिर्फ सामूहिक स्वर, तालियों की लय और माता की आराधना।


मंदिर के आसपास से गुजरने वाले लोग भी इस अनूठी परंपरा को देखकर कुछ क्षण ठहर जाते हैं। यहां गरबा केवल नृत्य नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही धार्मिक आस्था, पारिवारिक संस्कार और सांस्कृतिक विरासत की जीवंत अभिव्यक्ति है।

छत्रसाल के समय से जुड़ी है बुंदेलखंड में खेड़ावाल समाज की विरासत

खेड़ावाल गुजराती ब्राह्मण समाज की स्थानीय पारिवारिक परंपराओं के अनुसार बुंदेलखंड में इन परिवारों के आगमन का इतिहास महाराजा छत्रसाल के शासनकाल से जुड़ा है।

परिवारों की मान्यता के अनुसार सन 1737 के आसपास गुजरात से कुछ खेड़ावाल ब्राह्मण परिवार पन्ना आए। लगभग दो दशक बाद, सन 1759 के आसपास सागर के मराठा शासक गोविन्द पंत के बुलावे पर ये परिवार सागर आए और यहां नगर के विकास एवं निर्माण कार्यों से जुड़े।

इसी कालखंड में कुछ परिवार हटा, दमोह सहित बुंदेलखंड के अन्य नगरों में भी बसे। समय के साथ इन परिवारों की अगली पीढ़ियां मध्यप्रदेश के दूसरे शहरों, देश के महानगरों और विदेशों तक पहुंचीं।

भट्ट, त्रिवेदी, मेहता, धगट, पंड्या, दवे, डनायक, व्यास, सेलट और ध्यानी आदि कुलनामों से पहचाने जाने वाले इन परिवारों के बीच भौगोलिक दूरियां भले बढ़ीं, लेकिन गुजराती जड़ों, कुल परंपराओं, धार्मिक मान्यताओं और सांस्कृतिक विरासत से जुड़ाव बना रहा।


सागर का श्री मल्ली माता मंदिर इसी सांस्कृतिक निरंतरता का एक महत्वपूर्ण केंद्र है। स्थानीय परंपरा के अनुसार यहां एक शताब्दी से भी अधिक समय से खेड़ावाल परिवार पारंपरिक शैली में गरबा करते आ रहे हैं।

आधुनिक दौर में भी सुरक्षित है गरबे का मूल स्वरूप

गुजरात सहित देश और दुनिया में गरबा आज एक बड़े सांस्कृतिक उत्सव का रूप ले चुका है। आधुनिक संगीत, आकर्षक परिधान, विशाल आयोजन और मनोरंजन के नए आयाम गरबे से जुड़ गए हैं।

इसके विपरीत सागर के खेड़ावाल परिवारों के गरबे में आज भी देवी स्तुति और सामूहिक आराधना की पारंपरिक लोकशैली प्रमुख है।

इन गरबों की खासियत सहज लय, सामूहिक गायन और हाथों की दो अथवा तीन तालियों से बनने वाली ताल है। यहां नृत्य कौशल दिखाने से ज्यादा महत्व माता की भक्ति और आराधना का है।


सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि परिवारों की नई पीढ़ियां भी अपने बुजुर्गों के साथ इन आयोजनों में शामिल होती हैं। वे पारंपरिक गीतों, उनकी धुनों और आराधना की विधियों को सीखती हैं। इस तरह यह परंपरा केवल स्मृतियों में नहीं, बल्कि आज भी व्यवहार में जीवित है।


लोकगीतों में समाई है देवी के प्रति गहरी आस्था

खेड़ावाल समाज में गाए जाने वाले पारंपरिक गुजराती गरबों में देवी के प्रति श्रद्धा, समर्पण और आत्मीयता के भाव दिखाई देते हैं।

परंपरागत रूप से गणेश वंदना से गरबों की शुरुआत होती है—

'गुरु गणपति ने प्रथमे पाएं लागूं रे, चंडी मां...'

इसके बाद देवी की स्तुति में अलग-अलग पारंपरिक गरबे गाए जाते हैं।

'मां तमारा छे हजार नाम, कया नामे लखिए कंकोत्री।'

अर्थात—हे मां! आपके तो हजारों नाम हैं, आपको किस नाम से निमंत्रण लिखूं?


इन पंक्तियों में भक्त और देवी के बीच के आत्मीय संबंध की सुंदर अभिव्यक्ति दिखाई देती है। देवी यहां किसी दूरस्थ शक्ति के रूप में नहीं, बल्कि परिवार की आराध्य और स्नेहमयी माता के रूप में उपस्थित हैं।


इसी तरह—

'आज मां नो गरबो घूमतो जाय...'

माता की आराधना में आनंदपूर्वक घूमते गरबे और भक्तों के बीच देवी की दिव्य उपस्थिति का भाव व्यक्त करता है।

'मां तारो गरबो झाकमझोल...'

में माता के गरबे की जगमगाती ज्योति और उससे उत्पन्न आध्यात्मिक आनंद का वर्णन मिलता है।

वहीं—

'तू तो काली ने कल्याणी मां...'


में देवी के दो स्वरूपों की आराधना है। एक ओर वे दुष्ट शक्तियों का संहार करने वाली महाकाली हैं तो दूसरी ओर भक्तों का कल्याण और संरक्षण करने वाली करुणामयी माता।

'पंखीडा तू ऊडीने जाजे पावागढ़ रे...'


जैसे लोकगीत में भक्त एक पक्षी से अपनी प्रार्थना और श्रद्धा पावागढ़ की महाकाली माता तक पहुंचाने का 8भावपूर्ण आग्रह करता है।इन गीतों की विशेषता यह है कि लोकजीवन की सहज भाषा में गहरे आध्यात्मिक भाव व्यक्त किए गए हैं।


गुजराती गरबा साहित्य को 17वीं से 19वीं शताब्दी के अनेक भक्त कवियों ने समृद्ध किया। इनमें देवीभक्त कवि वल्लभ भट्ट, जिन्हें वल्लभ मेवाड़ा के नाम से भी जाना जाता है, का विशेष उल्लेख मिलता है। उनकी रचनाओं में देवी की महिमा और शक्ति की उपासना का प्रभावशाली वर्णन मिलता है।

गरबा : नृत्य से अधिक मातृशक्ति की उपासना

गरबा शब्द का संबंध संस्कृत के 'गर्भ' शब्द से माना जाता है, जो जीवन की उत्पत्ति और सृजन का प्रतीक है।

गुजराती परंपरा में 'गरबो' उस मिट्टी के पात्र को भी कहा जाता है, जिसमें दीपक प्रज्वलित किया जाता है। यह दीपक देवी की शक्ति और जीवन-ज्योति का प्रतीक माना जाता है। इस दीप के चारों ओर गोलाकार घूमकर गरबा करना जीवन के निरंतर गतिशील चक्र की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति माना जाता है। केंद्र में स्थित ज्योति आद्यशक्ति और दिव्य चेतना का प्रतिनिधित्व करती है।

इस दृष्टि से पारंपरिक गरबा केवल सामूहिक नृत्य नहीं, बल्कि जीवन, सृजन और जगदंबा की शक्ति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का आध्यात्मिक माध्यम भी है।

विश्व सांस्कृतिक विरासत में गरबा को मिला सम्मान

गुजरात की इस लोकपरंपरा को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी महत्वपूर्ण मान्यता मिली है। वर्ष 2023 में यूनेस्को ने गुजरात के गरबा को मानवता की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत की प्रतिनिधि सूची में शामिल किया।

यह सम्मान गरबा की धार्मिक, सांस्कृतिक और सामुदायिक महत्ता को रेखांकित करता है।

ऐसे में सागर के श्री मल्ली माता मंदिर में खेड़ावाल समाज द्वारा निभाई जा रही पारंपरिक गरबा आराधना इस विरासत के स्थानीय संरक्षण का उल्लेखनीय उदाहरण दिखाई देती है।

पीढ़ियों को अपनी जड़ों से जोड़ रही है परंपरा

सागर में बसे गुजराती मूल के खेड़ावाल परिवारों के लिए शारदीय नवरात्रि का यह आयोजन केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक पहचान से जुड़े रहने का अवसर भी है।

बुजुर्गों से सीखे गए गरबे अगली पीढ़ियों तक पहुंच रहे हैं। इनके साथ गुजराती भाषा के पुराने शब्द, लोकधुनें, पारिवारिक संस्कार और देवी आराधना की विशिष्ट परंपराएं भी सुरक्षित बनी हुई हैं।

आधुनिकता के बीच अपनी मौलिकता को बनाए रखने की यह साधना सागर की सांस्कृतिक विविधता को और समृद्ध करती है।

चकराघाट के मल्ली माता मंदिर में तालियों की सहज लय और सामूहिक स्वरों में गूंजती माता की स्तुति मानो यही संदेश देती है—सांस्कृतिक विरासत केवल इतिहास के पन्नों में नहीं होबती, वह उन पीढ़ियों में जीवित रहती है जो उसे श्रद्धा से जीती हैं।

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