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बुंदेलखंड का चमत्कारी अबार माता मंदिर! एक हजार साल पुराने मंदिर की अनोखी मान्यता, 75 फीट ऊंची चट्टान से जुड़ी है आस्था

बुंदेलखंड का चमत्कारी अबार माता मंदिर! एक हजार साल पुराने मंदिर की अनोखी मान्यता, 75 फीट ऊंची चट्टान से जुड़ी है आस्था

• मनोकामना के लिए उल्टा हाथ और मुराद पूरी होने पर सीधा हाथ रखने की परंपरा, आल्हा-ऊदल से भी जुड़ी है मंदिर की लोककथा


तीनबत्ती न्यूज: 15 अक्टूबर, 2026

सागर। बुंदेलखंड की धरती पर आस्था और लोकविश्वास की अनेक अनूठी परंपराएं देखने को मिलती हैं। इन्हीं में एक है अबार माता मंदिर, जहां करीब एक हजार साल पुराने मंदिर और 75 फीट ऊंची विशाल चट्टान से जुड़ी मान्यताएं श्रद्धालुओं को आकर्षित करती हैं। सागर-छतरपुर क्षेत्र और उत्तर प्रदेश की सीमा के आसपास प्रचलित इस धार्मिक परंपरा के प्रति लोगों में गहरी आस्था है। मान्यता है कि यहां सच्चे मन से मांगी गई मुराद माता रानी पूरी करती हैं। यही वजह है कि दूर-दूर से श्रद्धालु माता के दर्शन और पूजा-अर्चना के लिए पहुंचते हैं। नवरात्रि पर देवी जी के दर्शनों के लिए श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ी हुई है। 


75 फीट ऊंची चट्टान है मंदिर की खास पहचान

अबार माता मंदिर की सबसे खास विशेषता यहां मौजूद करीब 75 फीट ऊंची विशाल चट्टान है। इस चट्टान को लेकर स्थानीय लोगों के बीच एक अनोखी मान्यता प्रचलित है। कहा जाता है कि महाशिवरात्रि के अवसर पर चट्टान तिल भर बढ़ जाती है। इस दावे को लेकर लोगों में कौतूहल बना रहता है, हालांकि चट्टान के बढ़ने संबंधी मान्यता की वैज्ञानिक पुष्टि उपलब्ध नहीं है। इसके बावजूद श्रद्धालुओं के लिए यह चट्टान आस्था और विश्वास का महत्वपूर्ण केंद्र बनी हुई है।

उल्टे हाथ से मांगते हैं मन्नत, सीधे हाथ से जताते हैं आभार

अबार माता मंदिर की एक और अनूठी परंपरा श्रद्धालुओं का ध्यान खींचती है। यहां मनोकामना मांगते समय चट्टान पर उल्टा हाथ रखने की मान्यता है। वहीं, जब श्रद्धालु की मुराद पूरी हो जाती है, तो वह चट्टान पर सीधा हाथ रखकर माता के प्रति आभार व्यक्त करता है।मंदिर तक पहुँचने के लिए लगभग 50 सीढ़ियाँ चढ़नी पड़ती हैं। यहाँ हर वर्ष वैशाख महीने में विशाल मेला लगता है।


स्थानीय धार्मिक विश्वास के अनुसार, इस परंपरा के माध्यम से भक्त अपनी मनोकामना माता के समक्ष रखते हैं और मुराद पूरी होने पर धन्यवाद देते हैं। निःसंतान दंपतियों के बीच भी माता के आशीर्वाद को लेकर विशेष आस्था बताई जाती है।

आल्हा-ऊदल से जुड़ी है मंदिर की स्थापना की लोककथा

बुंदेलखंड के वीर योद्धा आल्हा-ऊदल का नाम यहां की लोकगाथाओं में विशेष स्थान रखता है। अबार माता मंदिर की स्थापना को लेकर भी उनसे जुड़ी एक लोककथा प्रचलित है। कहा जाता है कि जंगल में रात्रि विश्राम के दौरान आल्हा-ऊदल को देवी के दर्शन हुए थे। इसके बाद उन्होंने यहां मंदिर का निर्माण कराया।

आस्था, लोकसंस्कृति और रहस्य का अनूठा संगम

अबार माता मंदिर केवल पूजा-अर्चना का स्थल ही नहीं, बल्कि बुंदेलखंड की लोकपरंपराओं और धार्मिक विश्वासों का भी प्रतीक है। करीब एक हजार साल पुराने मंदिर की मान्यता, विशाल चट्टान से जुड़ी लोककथा और मन्नत मांगने की अनोखी परंपरा इसे विशिष्ट पहचान देती है।

पीढ़ियों से चली आ रही इन मान्यताओं के कारण अबार माता मंदिर श्रद्धालुओं के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। यहां की परंपराएं बुंदेलखंड की उस सांस्कृतिक विरासत की झलक पेश करती हैं, जिसमें लोककथाएं, धार्मिक विश्वास और जनआस्था एक-दूसरे से गहराई से जुड़े हुए हैं।

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