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सागर में चिकित्सा अनुसंधान को मिलेगी नई दिशा, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय और बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के बीच हुआ एमओयू

सागर में चिकित्सा अनुसंधान को मिलेगी नई दिशा, डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय और बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के बीच हुआ एमओयू


तीनबत्ती न्यूज: 30 अक्टूबर 2026

सागर। बुंदेलखंड क्षेत्र में चिकित्सा अनुसंधान, उच्च शिक्षा और वैज्ञानिक सहयोग को बढ़ावा देने के लिए डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय और बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज, सागर के बीच शोध, प्रशिक्षण एवं परामर्श सेवाओं के लिए समझौता ज्ञापन (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए गए।

इस समझौते के तहत दोनों संस्थान अपनी विशेषज्ञता, आधुनिक शोध प्रयोगशालाओं और उपलब्ध चिकित्सा सुविधाओं का संयुक्त उपयोग करेंगे। इसका प्रमुख उद्देश्य बुंदेलखंड क्षेत्र में प्रचलित बीमारियों के कारणों, उनके आनुवंशिक एवं आणविक आधार तथा बेहतर निदान और उपचार की संभावनाओं पर शोध करना है।

बीमारियों के कारणों पर होगा आधुनिक शोध

एमओयू के माध्यम से चिकित्सा विज्ञान, जैव प्रौद्योगिकी, आनुवंशिकी, जीनोमिक्स, फार्मेसी और आणविक जीव विज्ञान जैसे क्षेत्रों में संयुक्त शोध को प्रोत्साहन मिलेगा। डॉ. हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में उपलब्ध आधुनिक शोध प्रयोगशालाओं और वैज्ञानिक उपकरणों के साथ बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज की चिकित्सकीय विशेषज्ञता, मरीजों के नमूनों और चिकित्सा संबंधी जानकारियों का समन्वय किया जाएगा। इससे प्रयोगशाला आधारित शोध को वास्तविक चिकित्सा समस्याओं से जोड़ने में मदद मिलेगी। सभी शोध कार्य संबंधित नैतिक एवं नियामक नियमों के अनुरूप किए जाएंगे।

नई दवाओं और उपचार पद्धतियों की संभावनाएं तलाशेंगे विशेषज्ञ


बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज के अधिष्ठाता प्रो. पी. एस. ठाकुर ने कहा कि यह एमओयू केवल वैज्ञानिक ज्ञान के सृजन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि क्षेत्र में प्रचलित बीमारियों के लिए नई दवाओं, उपचार पद्धतियों और बेहतर चिकित्सा विकल्पों की संभावनाओं पर भी काम किया जाएगा। उन्होंने कहा कि विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी विभाग में उपलब्ध आधुनिक इंटीग्रेटिव जीनोमिक्स सुविधाएं बीमारियों के आनुवंशिक एवं आणविक स्तर पर अध्ययन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी।

कुलपति ने बताया मील का पत्थर

विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. नागेश दुबे ने इस एमओयू को बुंदेलखंड में चिकित्सा अनुसंधान एवं वैज्ञानिक सहयोग की दिशा में महत्वपूर्ण उपलब्धि और मील का पत्थर बताया। उन्होंने कहा कि दो प्रमुख शैक्षणिक एवं चिकित्सा संस्थानों के एक साथ आने से क्षेत्र में शोध और नवाचार का नया वातावरण तैयार होगा। बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज में स्थापित आधुनिक शोध सुविधा एमडीआरयू (MDRU) विश्वविद्यालय के विद्यार्थियों, शोधार्थियों और प्राध्यापकों के संयुक्त शोध एवं प्रशिक्षण कार्यक्रमों के लिए उपयोगी सिद्ध होगी।

विद्यार्थियों और शोधार्थियों को मिलेगा प्रशिक्षण


विश्वविद्यालय के कुलसचिव डॉ. एस. पी. उपाध्याय ने कहा कि शैक्षणिक एवं शोध संस्थानों के बीच आपसी सहयोग और समन्वय वर्तमान समय की आवश्यकता है। इस पहल से विद्यार्थियों को आधुनिक तकनीकों का व्यावहारिक ज्ञान और शोध संबंधी कौशल विकसित करने का अवसर मिलेगा।

एमओयू के अंतर्गत स्नातक, स्नातकोत्तर एवं पीएचडी विद्यार्थियों, मेडिकल इंटर्न, शोधार्थियों और प्राध्यापकों के लिए विशेष प्रशिक्षण कार्यक्रम, कार्यशालाएं, संगोष्ठियां और संयुक्त शोध परियोजनाएं आयोजित की जाएंगी। साथ ही, दोनों संस्थानों के विद्यार्थियों एवं विशेषज्ञों के आदान-प्रदान को भी बढ़ावा दिया जाएगा।

बायोमार्कर्स और शीघ्र निदान पर भी होगा अध्ययन


इस सहयोग के तहत मरीजों से प्राप्त चिकित्सकीय जानकारी और आधुनिक आणविक एवं आनुवंशिक तकनीकों के माध्यम से बीमारियों के कारणों, उनकी प्रकृति तथा संभावित जैविक संकेतकों (बायोमार्कर्स) का अध्ययन किया जाएगा।


इससे भविष्य में बीमारियों की शीघ्र पहचान, बेहतर निदान और बुंदेलखंड क्षेत्र की स्वास्थ्य संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप उपचार पद्धतियों के विकास के नए रास्ते खुल सकते हैं।


इन विशेषज्ञों ने जताई प्रतिबद्धता


एमओयू के विश्वविद्यालय समन्वयक प्रो. यू. के. पाटिल, जैव प्रौद्योगिकी विभाग की अध्यक्ष एवं अनुसंधान एवं विकास निदेशक प्रो. श्वेता यादव तथा बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज की एमडीआरयू समन्वयक प्रो. श्वेता भटनागर एवं डॉ. शशि मार्को, सदस्य सचिव, इंस्टीट्यूशनल एथिकल कमेटी ने इस सहयोग को प्रभावी रूप से आगे बढ़ाने की प्रतिबद्धता व्यक्त की।

इस अवसर पर विश्वविद्यालय के डॉ. सी. पी. उपाध्याय, डॉ. दीक्षी अंगिरा, बुंदेलखंड मेडिकल कॉलेज की डॉ. नीतू मिश्रा सहित विश्वविद्यालय एवं मेडिकल कॉलेज के विभिन्न विभागों के अनेक प्राध्यापक और विशेषज्ञ उपस्थित रहे।


इस एमओयू से बुंदेलखंड में चिकित्सा विज्ञान और आधुनिक जैविक अनुसंधान के बीच बेहतर तालमेल स्थापित होगा। साथ ही, क्षेत्र की स्वास्थ्य समस्याओं के वैज्ञानिक समाधान तलाशने और चिकित्सा शिक्षा एवं अनुसंधान को नई दिशा मिलने की उम्मीद है।



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