गुरुवार, 19 दिसंबर 2019

जब सांस में धड़कती हैं किताबें @राजेश बादल

जब सांस में धड़कती हैं किताबें 
@राजेश बादल
सीने में जलन आंखों में तूफ़ान सा क्यों है/इस शहर में हर शख़्स परेशान सा क्यों है/
उत्तर साफ़ है कि हमने अपनी ज़िंदगी से पढ़ने की आदत समाप्त कर दी है । सांसों के बिना देह का मतलब क्या है ? ज़िंदा लाश को उठाए फिरते हैं बेजान । न बड़ी गाड़ी सुकून देती है न मौटी वेतन न बड़ा मकान आलीशान । न दीवार के बराबर टीवी और न बड़ी जान पहचान । किसी ने गहराई से नहीं सोचा कि हम क्यों हैं परेशान ? 
तीन भूख़ हैं ज़िन्दगी में । पेट की भूख , देह की भूख और दिमाग़ की भूख। पहली दोनों भूख का आपको अहसास होता है,लेकिन तीसरी छिपी हुई है । उसका पता ही नहीं चलता ।वह साइलेंट किलर की तरह इंसान को मार डालती है । यह मेरी अब तक की ज़िन्दगी का निचोड़ है । तीस - पैंतीस बरस से कमोबेश हर सप्ताह एक किताब पढ़ने की आदत ने अंदर की बहुत सी ताक़त और संवेदना को बचाकर रखा है । यही सबसे बड़ी पूंजी है । इसे आपसे कोई लूट नहीं सकता । किताबों से जो आनंद मिलता है,अब सोचता हूं कि आप तक बीच बीच में पहुंचाऊं ।शायद यह और भी सुख देने वाली क्रिया होगी।
पत्रकारिता में अधिक गहराई से लेखन करने का अवसर  कम मिलता है लेकिन पत्रकार साथी और मेरे लिए छोटे भाई जैसे ब्रजेश राजपूत ने इस मिथक को तोड़ा है । उनकी तीसरी किताब चुनाव है बदलाव का - बाज़ार में आ चुकी है । इससे पहले उनकी दो पुस्तकों को पाठकों ने हाथों हाथ लिया है ।कल इस पुस्तक का विमोचन भोपाल में मुख्यमंत्री कमलनाथ ने किया । इस आयोजन में बृजेश के जलेबी नुमा सवाल का गोल रोटी जैसा उत्तर मुख्यमंत्री ने दिया । बकौल बृजेश , मैंने उनसे पूछा कि आपने चार सीटों में से कैसे यह गणित लगाया कि दो जीत रहे हैं और दो हार रहे हैं । कमलनाथ ने साफ तौर पर स्वीकार किया कि प्रचार अभियान में ही पता लग जाता है कि जीत होगी या हार । दो तरह की भीड़ सभाओं में होती है । वह या तो लाई होती है या स्वतः आई होती है ।बस लाई और आई से पता लग जाता है । बहरहाल इस किताब पर विस्तृत टिप्पणी किताब पढ़ने के बाद । 
अभी तो बता दूं कि इन दिनों  उपहार में  प्राप्त या खरीदी गई किताबों में से एक खुशवंत सिंह की आत्मकथा सच,प्यार और थोड़ी सी शरारत दूसरी बार पढ़ रहा हूं ।इससे पहले मित्र प्रमोद भार्गव का ग्रंथ दशावतार पढ़ा । अगली पुस्तक भाई पंकज सुवीर की  है - जिन्हें जुर्मो इश्क़ पे नाज़ था । सुनील खिलनानी की किताब अवतरण इसके बाद । अवतरण में भारत की 50 विभूतियों के बारे में गहराई से विवेचन है । इसके बाद देवानंद की आत्मकथा रोमांसिंग विथ लाइफ कतार में है । उसके बाद उर्दू  शायरी और शायरों पर प्रकाश पंडित की तरह ही बड़ा काम नए सिरे से हुआ है । ज़ौक ,इक़बाल,मोमिन, दाग़, मीर, जफर और ग़ालिब पर मंजुल प्रकाशन ने एक लंबी श्रृंखला शुरू की है । यह शानदार है । दिखने में अच्छी लगती है । बाकी पढ़ने के बाद लिखूंगा । इन्हीं पुस्तकों के कवर आप देख सकते हैं।

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