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भारतरत्न कर्पूरी ठाकुर : सत्ता में रहकर अपनी सादगी से सबको प्रेरित किया ▪️कर्पूरी जी के घनिष्ठ साथी रहे है रघु ठाकुर ▪️लेखक : जयंत सिंह तोमर

भारतरत्न कर्पूरी ठाकुर : सत्ता में रहकर अपनी सादगी से सबको प्रेरित किया

▪️कर्पूरी जी के घनिष्ठ साथी रहे है रघु ठाकुर

▪️लेखक : जयंत सिंह तोमर 


तीनबत्ती न्यूज : 10 अप्रैल, 2026

भारतरत्न कर्पूरी ठाकुर भारत के सार्वजनिक जीवन के उन नायकों में से थे जिन्होंने सत्ता में रहकर अपनी सादगी से सबको प्रेरित और आश्चर्यचकित तो किया ही , देश के वंचित और भूमिहीन समुदाय का जीवन बेहतर बनाने के लिए अथक प्रयास किए। ऐसा कहा जाता है कि अविभाजित बिहार में ऐसी कोई पगडंडी नहीं थी जिस पर होकर कर्पूरी ठाकुर न गुजरे हों।

जनवरी 1924 को बिहार में समस्तीपुर जिले के  पितौंझिया में जनमे कर्पूरी ठाकुर दो बार बिहार के मुख्यमंत्री रहे। साल 1988 में उनके निधन के बाद जब प्रसिद्ध राजनेता हेमवती नंदन बहुगुणा  पितौंझिया में उनके घर गए तो यह देखकर हैरान रह गए कि कर्पूरी ठाकुर का घर मिट्टी का बना हुआ था।जिसके उपर फूस  का छप्पर था।

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केन्द्रीय मंत्री रहे यशवंत सिन्हा कभी मुख्यमंत्री कर्पूरी  ठाकुर के सचिव हुआ करते थे। उन्होंने अपने संस्मरणों में लिखा है कि एक बार जब वे मुख्यमंत्री के साथ  पितौंझिया गये तो कर्पूरी जी के पुश्तैनी घर में उन्हें बिठाने के लिए कोई कुर्सी नहीं थी। लेकिन कर्पूरी जी की पत्नी ने बड़ी आत्मीयता से उन्हें चाय बनाकर पिलाई। 

शिविर में था इंतजार उसी दिन हुआ निधन

सागर में जनमे भारत के सोशलिस्ट नायक रघु ठाकुर कर्पूरी जी के घनिष्ठ साथी रहे। जिस दिन कर्पूरी जी का निधन हुआ उसी दिन 17 फरवरी 1988 को रघु ठाकुर द्वारा छत्तीसगढ़ के अकलतरा में आयोजित एक कार्यकर्ता शिविर में कर्पूरी जी  को आना था। जब लोग उनके आने को का  इंतजार कर रहे थे तभी उनके  दुनिया से जाने की सूचना  मिली।

अंग्रेजी अच्छी जानते थे कर्पूरी जी

कर्पूरी जी बहुत अच्छी अंगरेजी बोलते थे। लेकिन वे यह भी मानते थे कि अंगरेजी और भाषाओं की तरह केवल एक भाषा है और यह बिलकुल जरूरी नहीं कि अंगरेजी जानने वाला ज्ञानी भी हो। यही कारण था कि बिहार के शिक्षामंत्री रहते हुए कर्पूरी ठाकुर ने अंगरेजी  की अनिवार्यता  समाप्त कर कमजोर विद्यार्थियों को बोर्ड परीक्षा में  पास होने  का  मार्ग प्रशस्त किया और उनके आगे बढ़ने का रास्ता साफ किया। 

डॉ लोहिया ने बिहार में जो  वैचारिक जमीन  तैयार की थी उसे कर्पूरी ठाकुर ने  आगे बढ़ाने का काम किया। यदि उन्होंने उस  जमीन  को  निरंतर आगे नहीं  बढ़ाया होता तो बिहार में पिछड़े और अति पिछड़े कभी न सत्ता में आ पाते न इस वर्ग का कोई व्यक्ति मुख्यमंत्री बन पाता। कर्पूरी जी बहुत पढ़ाकू थे। हर यात्रा में किताबों का बस्ता उनके साथ रहता ही था।

परिवारवाद के विरोधी

परिवारवाद के वे विरोधी थे। जब उनके बेटे रामनाथ ठाकुर को चुनाव टिकट देने के लिए कहा गया तो कर्पूरी ठाकुर ने यह कहते हुए साफ़ मना कर दिया कि ऐसा करेंगे तो दूसरे दलों के वंशवाद और परिवारवाद की आलोचना कैसे करेंगे।

सादगी के कई किस्से प्रचलित

कर्पूरी जी की सादगी के अनेक किस्से प्रचलित हैं। बताते हैं उनके फटे कुर्ते को देखकर जब नये कुर्ते के लिए चंदा किया गया तो वह पैसा भी कर्पूरी ठाकुर ने पार्टी फंड में जमा करा दिया। वे जरूरत पड़ने पर स्टेशन पर ही अखबार बिछाकर सो लेते थे। मुख्यमंत्री रहने के बाद भी वे साइकिल, रिक्शा की सवारी में देखे जा सकते थे। एक बार जब वे रघु ठाकुर जी से मिलने सागर आये तो वापसी की बस पकड़ने की जल्दी में मोटरसाइकिल पर बैठकर गये। 

गुटनिरपेक्ष आंदोलन के नेता यूगोस्लाविया के मार्शल टीटो कर्पूरी जी को बहुत मानते थे। समाजवादी युवाओं के एक अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन में मार्शल टीटो की कर्पूरी जी से मित्रता हुई थी। एक बार टीटो उनके लिए उपहार स्वरूप एक ओवरकोट भी लाये थे।

मुख्यमंत्री बनने के बाद कर्पूरी ठाकुर ने जब देखा कि मंत्रालय में विशिष्ट लोगों और आम आदमी के लिए अलग-अलग लिफ्ट की व्यवस्था है तो तत्काल उन्होंने इस भेदभावपूर्ण व्यवस्था को समाप्त करने के निर्देश दिए। 

उनसे मिलने आने वालों का तांता लगा ही रहता था। जरूरी सरकारी कामकाज निपटाने के लिए अगर उनकी कहीं एकान्त में बैठने की व्यवस्था की जाती तब भी उनकी सहजता के कारण लोग धीरे-धीरे पता लगाकर वहां भी आ जाते। मुख्यमंत्री आवास से कार्यालय के रास्ते में कोई भी परिचित उन्हें मिलता वे अपनी गाड़ी में बैठने के लिए जरूर कहते चाहे गाड़ी में जगह हो या न हो। 

उनके समय में मुख्यमंत्री आवास के एक कोने में आटा- दाल और आलू- प्याज रखा ही रहता था जिससे गांव से आने वाले आगंतुकों को भोजन की दिक्कत न हो। 

कर्पूरी जी के मन में गरीब और पिछड़ों के प्रति गहरी करुणा थी। लेकिन ऊंची जाति के या साधन-संपन्न लोगों के प्रति कोई विद्वेष उनमें बिलकुल नहीं रहा। कर्पूरी जी के मुख्यमंत्री रहते हुए गांव  पीतौंझिया में उनके पिता के साथ ऊंची जाति के दबंगों ने दुर्व्यवहार किया था। जब प्रशासन के लोग दबंगों पर कार्रवाई के लिए पहुंचे तो कर्पूरी जी ने कहा था कि केवल मुख्यमंत्री के पिता को ही क्यों राहत मिले, अगर प्रशासन का सहयोग मिलना है तो हर गरीब को मिलना चाहिए।

गरीबों पर अत्याचार की एक घटना से द्रवित होकर कर्पूरी ठाकुर ने कमजोर समुदाय के लोगों को बंदूक का लायसेंस देने की भी व्यवस्था की थी।

बेटा सीएम लेकिन पिता ने नहीं छोड़ा पुश्तैनी काम

यह किस्सा बहुत प्रचलित है कि एक बार उनकी बिरादरी का नौजवान जब उनसे नौकरी मांगने मुख्यमंत्री निवास पहुंच गया तो कर्पूरी जी ने उसे हजामत बनाने का सामान खरीदने का पैसा दिया और कहा कि रोजगार का जो पुश्तैनी साधन है उसे क्यों छोड़ते हो। ऐसा बताते हैं कि कर्पूरी ठाकुर जब मुख्यमंत्री बन गये तब भी उनके पिता ने पितौंझिया के लोगों के बाल काटने और हजामत बनाने का काम नहीं छोड़ा था। 

कर्पूरी ठाकुर ने स्वतंत्रता संग्राम में तो भाग लिया ही था देश में जब इमर्जेंसी लगी तब भी वे भूमिगत रहकर सक्रिय थे। वेश बदलकर वे नेपाल से मद्रास तक गये। समाज के हर कमजोर वर्ग को आरक्षण का जो समावेशी फार्मूला उन्होंने दिया था उसकी सराहना आज भी सब करते हैं।

11 अप्रैल को सागर में हो रही है प्रतिमा स्थापित



कर्पूरी ठाकुर के इसी व्यक्तित्व को हमेशा याद रखने के लिए सोशलिस्ट नायक रघु ठाकुर की पहल से सागर में कर्पूरी जी की प्रतिमा लगाई गई है जिसका अनावरण ग्यारह अप्रैल को मध्यप्रदेश के विधानसभा अध्यक्ष, इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र के अध्यक्ष, केन्द्रीय जलशक्ति मंत्री सहित अनेक विशिष्ट जनों की उपस्थिति में होगा। कर्पूरी ठाकुर  की स्मृति में मध्यप्रदेश छत्तीसगढ़ में यह पहली प्रतिमा है जिससे आनेवाली पीढ़ियां प्रेरणा लेंगी।


लेखक : जयन्त सिंह तोमरभारत रत्न कर्पूरी ठाकुर प्रतिमा स्थापना  समिति 

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