रविवार, 1 मार्च 2020

ये दागदार उजाला और वो तीन छोटे बल्ब,,,, ब्रजेश राजपूत/ सुबह सवेरे में ग्राउंड रिपोर्ट

ये दागदार उजाला और वो तीन छोटे बल्ब,,,,

 ब्रजेश राजपूत/ सुबह सवेरे में ग्राउंड रिपोर्ट 

जबलपुर के बाहर खमरिया की पहाडी की उंचाई से जगमगाते शहर का नजारा देखते ही बन रहा था। उपर आसमान में तारे चमक रहे थे तो नीचे जमीन पर लाखों रोशनियाँ थी। ये बिजली की रोशनी तरक्की और विकास का प्रतीक है। पिछले सत्तर सालों में जबलपुर कस्बा पहले बडा शहर और अब महानगर बनने की राह पर है। शहर से निकल रही रोशनियाँ आकाश से आ रही तारों की टिमटिमाहट को फीका कर रही थी। शहर में घुसते ही हर और बडे बडे होर्डिग्स और चमकीले बैनरों की जोरदार चमक थी और पूरे शहर में उजाला ही उजाला था मगर होर्डिग्स पर लगे ये सैंकडों लाइट और एलईडी की मीटर मीटर भर लंबी रंगबिरंगी झालरों की रोशनी मुझे चुभ रही थी। वजह शायद ये रही हो कि मैं इस बडे शहर से डेढ सौ किलोमीटर दूर उस जगह से आ रहा था जहाँ पर मकान में एलईडी के छोटे छोटे तीन बारीक से बल्ब भी दिन भर सोलर पैनल से ऊर्जा इकटठी कर रात में बडे संघर्ष के बाद जल पाते हैं। 
डिंडोरी जिले के माधोपुरा पंचायत के ददरा टोला गांव में अलग अलग बिखरे हुये दस पंद्रह घर हैं। मगर इन घरों को घर कहने में भी हमें हिचक होती है क्योंकि हम शहर के लोग घर यानिकी टू और थ्री बीएचके को ही मानते है। मगर ददरा टोला के अनंदी सिहं पंद्रो के लिये तो ये उनका घर नहीं बंगला था जिसमें आगे छोटा बगीचा है इसी घर से लगा उनका खेत है इसी घर में एक तरफ उनके पालतू जानवरों की जगह है। और घर के आगे आंगन है जहां उनके परिवार के बच्चे और दो तीन पालतू कुत्ते हलचल मचाते रहते हैं। आंगन में ही वो भुटटे सूख रहे हैं जिनके दाने निकाल लिये गये हैं और साथ ही भुटटे के उपर लिपटे पत्तों को जानवरों को खिलाने के लिये सुखाया जा रहा है। पंद्रो का घर की पहचान ये भी है कि घर के पिछवाडे ही सड़क से बिजली का तार खीचकर दो बडे खंबों पर ट्रांसफार्मर और मीटर लगा है। पंद्रो इस बात से खुश है कि उसके घर के पास ही ट्रांसफार्मर लग गया है मगर वो दुखी इस बात पर होता है कि महीनों पहले ये टांसफार्मर लग तो गया है मगर इसमें करंट या बिजली अब तक नहीं आयी है। हमें बिजली विभाग का अफसर जान कर हाथ जोडकर कहता है कि श्रीमान से निवेदन है कि इस ट्रांसफार्मर में करंट छोड दीजिये जिससे हमारे घर बिजली आ जाये हमारी समस्या की अति है साहब झींटी तापकर गुजारा करते हैं, मिटटी के तेल की बाती भी हम रोज नहीं जला पाते क्योंकि वो तेल कभी मिलता है कभी नहीं और उसे लेने दूर तक पैदल ही जाना पडता है। हमारे भी छोटे छोटे बच्चे हैं वो भी रात में पढना चाहते हैं तो साहब हमारी झोपडी में बिजली पहुँचा दो तो हम भी मानें कि हमारा विकास हो गया। अनंदी सिहं के बेटे देवेद्र भी ये बात सुनकर ऐसा सवाल कर बैठा जिसका जबाव हमारे पास नहीं था कि साहब ये ट्रांसफार्मर यहां चार महीने से लगा है फिर दो कदम पर हमारे घर तक बिजली क्यों नही आ रही और कितने महीने साल हमको बिजली की राह देखनी होगी। जब खंबा गडा हमने नारियल फोडा, फिर जब ट्रांसफार्मर टंगा तब हमने नारियल फोडा अब करंट आने का नारियल कब फोडेंगे। कब तक हम नकली बिजली से काम चलायेंगे। हमने कहा कि भाई ये नकली बिजली क्या होती है और इससे कैसे कामचलता है बताओ जरा। इस पर वो अपने घर के अंदर ले गया। कच्चे कबेलू वाले कम उंचाई के दरवाजे वाली इस झोपडी में सर झुकाकर घुसते ही देखा कि एक आले में छोटी सी बैटरी रखी थी जिसमें दो क्लिप के साथ एक छह इंच लंबी छोटी सी झालर टंगी थी जिसमें तीन नन्हे से बल्ब लगे थे। बैटरी में क्लिप लगाते ही इन छोटे से बल्ब चमकने लगे। तो यही है नकली बिजली इससे गुजारा हो जाता है। हां साब झोपडी में थोड़ी मोडी रोशनी हो जाती है इन बल्बों से। हमारे आस पास के घरों में भी बिजली का यही इंतजाम हैं। तो कितने में आया ये सब। जी दो हजार रूप्ये का सोलर पैनल लेकर कबेलू के उपर रख दिया और उसे इस बेटरी से कनेक्ट कर इस नकली बिजली पर ढाई तीन हजार खर्च किये हैं। मेरे लिये ये कल्पना करनी कठिनहो रही थी कि चारों तरफ सुनसान जंगल और  खेत से घिरे इस घर में जब ये छोटे छोटे एलईडी के तीन नन्हे बल्ब जलते होंगे तो इससे कितना उजाला होता होगा और उस उजाले में ये परिवार क्या करता होगा। क्या बच्चे इस नकली उजाले में पढते होंगे या फिर ये उजाला सिर्फ उजाले का अहसास कराने के लिये ही होता होगा। अब सर कुछ नहीं से कुछ होना तो अच्छा ही है। जब बिजली आयेगी तब आयेगी। वैसे पहले खंबे लगे तब लगा कि अब बिजली आने वाली है हमारा अंधेरा दूर हो जायेगा उसके बाद जब ट्रांसफार्मर लगा फिर लगा कि अब तो जल्दी ही अंधेरा दूर होजायेगा मगर अब आप मीडिया वाले आ गये हो तो फिर लगने लगा है कि अब तो बिजली आ ही जायेगी और हमारा घर असल बिजली से चमचमायेगा। वेसे साहब हमको ज्यादा बिजली भी नहीं चाहिये बस दो बल्ब जल जायें एक घर के अंदर और एक बाहर इतने में ही हमारा काम हो जायेगा तो आप जरा पहुंचा दीजिये बिजली हमारे गांव में। हाथ जोडकर बोला देवेंद्र पंद्रो। 
तो ये सारी बातें सुनकर आने के बाद भला किसी को जबलपुर की सडकों पर बिखरी ये बर्बादी की हद तक बेतहाशा फैली बिजली किसको अच्छी लगेगी। अभी बिजली विभाग में काम करने वाले हमारे मित्र ने बताया कि प्रदेश में बीस हजार मेगावाट बिजली की उपलब्धता है और इसमें भी यदि हमारे ददरा टोला के अनंदी सिहं को तीन एलईडी के छोटे बल्ब जलाने पड रहे हैं तो ऐसी बिजली का क्या अचार डालना। 
ब्रजेश राजपूत, एबीपी न्यूज,  भोपाल

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